यह कार्तिक माहात्म्य का कोई अध्याय नहीं, बल्कि वह लोककथा है जो कार्तिक के महीने में स्नान के बाद घर-घर कही जाती है। यह बुढ़िया माई और खिचड़ी के कटोरे की कहानी है।
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एक गाँव में एक बुढ़िया माई रहती थी। दुनिया में उसका कोई नहीं था, न बेटा, न बहू, न कोई अपना। पर उसके मन में भगवान के लिए बड़ी श्रद्धा थी। हर साल कार्तिक आता तो वह व्रत रखती। रोज़ मुँह-अँधेरे उठती और गंगा जी में स्नान करने जाती।
भगवान की लीला देखिए। जब वह स्नान करके लौटती तो उसकी खिड़की पर खिचड़ी से भरा एक कटोरा रखा मिलता। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उसके लिए रख जाते थे। बुढ़िया माई भगवान का नाम लेकर वही खिचड़ी खाती और अपना व्रत खोलती। ऐसे ही बरसों बीत गए।
पड़ोस में रहने वाली एक औरत को यह बात बिल्कुल नहीं सुहाती थी। वह सोचती कि इस बुढ़िया का तो कोई नहीं है, फिर इसे रोज़ भरा कटोरा कहाँ से मिल जाता है? एक दिन बुढ़िया माई गंगा स्नान को गई हुई थी और भगवान रोज़ की तरह कटोरा रख गए। पड़ोसन ने चुपके से कटोरा उठाया और खिचड़ी समेत बुढ़िया के घर के पीछे फेंक दिया।
बुढ़िया माई लौटी तो खिड़की खाली थी। उस दिन वह भूखी ही रह गई। फिर वह रोज़ यही पूछती फिरती कि कहाँ गई मेरी खिचड़ी, और कहाँ गया मेरी खिचड़ी का कटोरा?
उधर जहाँ खिचड़ी गिरी थी, वहाँ एक पौधा उग आया और उस पर दो सुंदर फूल खिले। उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैलती थी। एक दिन उस राज्य का राजा उधर से निकला। उसे फूल बहुत अच्छे लगे और उसने उन्हें तोड़कर रानी को दे दिया। रानी ने जैसे ही फूलों को सूँघा, भगवान की कृपा से उसकी गोद भर गई। समय आने पर उसने दो सुंदर राजकुमारों को जन्म दिया।
राजकुमार बड़े हुए, पर वे किसी से बोलते ही नहीं थे, न माता से, न पिता से। राजा-रानी बड़े दुखी रहते। एक दिन दोनों राजकुमार शिकार खेलने वन की ओर गए। रास्ते में वही बुढ़िया माई मिली, जो अब भी पूछ रही थी कि कहाँ गई मेरी खिचड़ी, कहाँ गया मेरा कटोरा? और जो राजकुमार किसी से नहीं बोलते थे, वे बोल पड़े कि हम हैं तेरी खिचड़ी, और हम हैं तेरा कटोरा!
बात राजा तक पहुँची। उसने आदर से बुढ़िया माई को दरबार में बुलवाया और पूछा कि माई, मेरे बेटे किसी से नहीं बोलते, फिर तुमसे कैसे बोले? बुढ़िया माई ने अपने कार्तिक व्रत और भगवान की खिचड़ी की सारी बात कह सुनाई। तब राजकुमारों ने भेद खोला कि माई, जो खिचड़ी फेंकी गई थी उसी से दो फूल खिले, उन्हीं फूलों से हम जन्मे, और भगवान ने ही हमें तुम्हारे लिए भेजा है।
यह सुनकर राजा ने बुढ़िया माई के चरण छुए, उसका बड़ा मान किया और उसे जीवन भर के लिए आदर से अपने महल में रख लिया। उस दिन से राजकुमार भी सबसे हँसकर बोलने लगे। कहानी इसी प्रार्थना पर पूरी होती है कि हे कार्तिक महाराज, जैसे आपने बुढ़िया माई की सुनी, वैसे ही आपका व्रत करने वाले सबकी सुनना। कहानी कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले, सब पर अपनी कृपा रखना।
बुढ़िया माई का कोई नहीं था, फिर भी कहानी कहती है कि वह अकेली नहीं थी। भगवान स्वयं उसके भोजन की चिंता करते थे।
पड़ोसन की ईर्ष्या ने उससे एक समय का भोजन छीना, पर इस कहानी में फेंकी हुई खिचड़ी भी व्यर्थ नहीं गई। वही जीवन भर के आदर और सहारे के रूप में बुढ़िया माई के पास लौटी। कहानी बस श्रद्धा माँगती है, और हर साल निष्ठा से निभाया गया व्रत।
यह कहानी कब कही जाती है?
कार्तिक के महीने में, स्नान के बाद, घर-घर में।
बुढ़िया माई की खिड़की पर खिचड़ी कौन रखता था?
कहानी के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उसके लिए रख जाते थे।
पड़ोसन ने क्या किया?
उसने चुपके से कटोरा उठाया और खिचड़ी समेत बुढ़िया के घर के पीछे फेंक दिया।
राजकुमार बुढ़िया माई से ही क्यों बोले?
वे उन्हीं दो फूलों से जन्मे थे जो उसकी खिचड़ी से खिले थे, और उन्होंने बताया कि भगवान ने उन्हें उसी के लिए भेजा है।
अंत में बुढ़िया माई का क्या हुआ?
राजा ने उसके चरण छुए, उसका मान किया और उसे जीवन भर के लिए आदर से अपने महल में रख लिया।
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