यह कार्तिक माहात्म्य का छठा अध्याय है। देवर्षि नारद राजा पृथु को कार्तिक स्नान की पूरी विधि बताते हैं कि कहाँ स्नान करें, कैसे करें और स्नान के बाद क्या करें।
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नारद जी ने कहा कि व्रती सूर्योदय से लगभग दो घड़ी पहले उठे और तुलसी की जड़ की मिट्टी, एक स्वच्छ वस्त्र और जल का कलश लेकर जलाशय की ओर जाए। फिर उन्होंने समझाया कि अलग-अलग जगह के स्नान का पुण्य अलग होता है, और यह पुण्य गर्म जल से लेकर तीन नदियों के संगम तक क्रम से बढ़ता जाता है।
जल में उतरने से पहले भगवान का ध्यान करें और स्नान का संकल्प लें। तीर्थ के देवताओं को अर्घ्य देकर प्रार्थना करें कि हे दामोदर, हे जनार्दन, मैं आपकी प्रसन्नता के लिए कार्तिक में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर रहा हूँ। मेरे पाप नष्ट हों और मुझे कार्तिक व्रत का पुण्य मिले। फिर भगवान विष्णु, शिव और सूर्य देव का ध्यान करते हुए नाभि तक जल में खड़े होकर स्नान करें।
गृहस्थ तिल और आँवले का उबटन लगाकर स्नान करें। विधवा या संन्यासी तुलसी की जड़ की मिट्टी से स्नान करें। स्नान के समय यह प्रार्थना करें कि जिन भगवान विष्णु ने देवताओं के लिए तीन पग में तीनों लोक नाप लिए, वे मुझे पवित्र करें। वेद, ऋषि, देवता, नदियाँ, पर्वत और औषधियाँ, सब मुझे पवित्र करें।
स्नान के बाद हाथ में कुशा की पवित्री पहनकर देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करें। नारद जी कहते हैं कि तर्पण में जितने तिल अर्पित होते हैं, उतने वर्षों तक पितर स्वर्ग में निवास करते हैं।
फिर जल से बाहर आकर स्वच्छ वस्त्र पहनें और चंदन, फूल और फल से भगवान विष्णु की दोबारा पूजा करें। अर्घ्य देते हुए कहें कि प्रभु, राधा जी के साथ मेरा यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए। इसके बाद वेद पढ़ने वाले विद्वान ब्राह्मणों को चंदन, फूल और पान देकर प्रणाम करें। नारद जी के अनुसार विद्वानों के चरणों में तीर्थ, मुख में वेद और अंगों में देवता बसते हैं, इसलिए उनका कभी अपमान न करें।
अंत में तुलसी माता की पूजा और परिक्रमा करें और प्रणाम करके कहें कि हे विष्णुप्रिया, देवताओं ने तुम्हें रचा, ऋषियों ने तुम्हें पूजा, मेरे पाप नष्ट करो। नारद जी कहते हैं कि जो इस विधि से भक्ति के साथ कार्तिक स्नान करता है, वह इस लोक में सुख भोगता है, उसके पितर भी तृप्त होते हैं और अंत में उसे मोक्ष मिलता है।
हर किसी के लिए नदी तक जाना संभव नहीं होता, और इस अध्याय की सीख इसका भी ध्यान रखती है। घर पर स्नान करें तो जल में थोड़ा गंगाजल मिला लीजिए। स्नान से पहले भगवान का ध्यान और संकल्प कीजिए, और स्नान के बाद तुलसी जी की परिक्रमा ज़रूर कीजिए।
नारद जी ने पुण्य का यह क्रम बताया है, जिसमें हर स्थान पिछले से बढ़कर है।
अध्याय के अनुसार सप्तमी, अमावस्या, नवमी, त्रयोदशी, द्वितीया और दशमी को तिल और आँवले से स्नान नहीं करते।
स्नान के लिए व्रती अपने साथ क्या ले जाए?
तुलसी की जड़ की मिट्टी, एक स्वच्छ वस्त्र और जल का कलश।
नारद जी के अनुसार सबसे अधिक पुण्य कहाँ के स्नान का है?
जहाँ तीन नदियाँ मिलती हों। वहाँ के स्नान का पुण्य उन्होंने अनंत बताया है।
तिल-आँवले से कौन स्नान करे और तुलसी की मिट्टी से कौन?
गृहस्थ तिल और आँवले के उबटन से, और विधवा या संन्यासी तुलसी की जड़ की मिट्टी से।
तर्पण के बारे में नारद जी क्या कहते हैं?
वे कहते हैं कि जितने तिल अर्पित होते हैं, उतने वर्षों तक पितर स्वर्ग में निवास करते हैं।
घर पर स्नान करें तो क्या करें?
अध्याय की सीख है कि जल में थोड़ा गंगाजल मिलाएँ, पहले ध्यान और संकल्प करें, और बाद में तुलसी की परिक्रमा करें।
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