यह कार्तिक माहात्म्य का आठवाँ अध्याय है। देवर्षि नारद कार्तिक व्रत के उद्यापन की विधि बताते हैं, यानी इस व्रत को विधि से पूर्ण कैसे किया जाए।
वीडियो में सुनिए: यह अध्याय हमारे YouTube चैनल पर हिंदी में सुनें। सभी अध्यायों की सूची कार्तिक माहात्म्य कथा पृष्ठ पर है।
नारद जी ने कहा कि भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को उद्यापन करें। तुलसी जी के ऊपर केले के खंभों से सुंदर मंडप बनाएँ और चारों ओर दीपों की पंक्ति सजाएँ। मंडप में चार द्वार बनाकर उन्हें फूलों और बंदनवार से सजाएँ। हर द्वार पर मिट्टी के दो-दो द्वारपाल बनाकर उनकी पूजा करें। ये हैं जय, विजय, चंड, प्रचंड, नंद, सुनंद, कुमुद और कुमुदाक्ष।
तुलसी की जड़ के पास चार रंगों से सर्वतोभद्र मंडल बनाएँ। उस पर पंचरत्न के साथ कलश स्थापित करें और कलश पर शंख, चक्र और गदा धारी भगवान विष्णु की पूजा करें। चतुर्दशी को भक्ति से उपवास करें और रात भर भजन, कीर्तन और वाद्य के साथ जागरण करें।
नारद जी ने इस जागरण की महिमा भी बताई। उनके अनुसार जो रात भर भगवान के भजन गाता है, उसके सैकड़ों जन्मों के पाप मिट जाते हैं। जो भगवान के सामने नाचता-गाता है, उसके अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं। और जो बाँसुरी या वाद्य बजाकर भक्तों को प्रसन्न करता है, उसे करोड़ों तीर्थों का फल मिलता है।
पूर्णिमा की सुबह स्नान और पूजा करके एक ब्राह्मण दंपति को आदर से बुलाएँ। वेदी पर अग्नि स्थापित करके भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए तिल और खीर से हवन करें। हवन के बाद ब्राह्मणों का भक्ति से पूजन करें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा दें।
फिर उनसे क्षमा माँगकर प्रार्थना करें कि भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों, मेरे सात जन्मों के पाप नष्ट हों, मेरी संतान चिरंजीवी हो और अंत में मुझे विष्णुलोक मिले। इसके बाद पूजा की सामग्री के साथ गुरु को गौ का दान करें और फिर परिवार और मित्रों के साथ भोजन करें।
पूजा चतुर्दशी को ही क्यों? नारद जी बताते हैं कि द्वादशी को भगवान निद्रा से जागते हैं, त्रयोदशी को देवताओं से मिलते हैं और चतुर्दशी को सब उनके दर्शन और पूजन करते हैं। पूर्णिमा को पुष्कर तीर्थ की यात्रा सबसे श्रेष्ठ कही गई है। नारद जी कहते हैं कि जो श्रद्धा से इस उद्यापन की महिमा सुनता या सुनाता है, उसे भगवान विष्णु का सायुज्य मिलता है।
पूरी विधि भव्य है, पर इस अध्याय से मिलने वाली सीख हर घर के लिए सहज है। कार्तिक के अंत में घर पर ही तुलसी जी के पास दीप जलाकर सरल उद्यापन कीजिए, और किसी ज़रूरतमंद को भोजन या दान दीजिए।
यहाँ उद्यापन का क्या अर्थ है?
यह वह विधि है जिससे कार्तिक का व्रत पूर्ण होता है, जैसा नारद जी ने इस अध्याय में बताया है।
मंडप के आठ द्वारपाल कौन हैं?
जय, विजय, चंड, प्रचंड, नंद, सुनंद, कुमुद और कुमुदाक्ष। चारों द्वारों पर दो-दो, मिट्टी के बने हुए।
पूजा चतुर्दशी को ही क्यों होती है?
नारद जी के अनुसार द्वादशी को भगवान जागते हैं, त्रयोदशी को देवताओं से मिलते हैं और चतुर्दशी को सब उनके दर्शन और पूजन करते हैं।
पूर्णिमा के हवन में क्या अर्पित होता है?
भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए तिल और खीर।
क्या उद्यापन घर पर सरल रूप में हो सकता है?
अध्याय की सीख यही कहती है। कार्तिक के अंत में तुलसी जी के पास दीप जलाइए और किसी ज़रूरतमंद को भोजन या दान दीजिए।
पिछला अध्याय: अध्याय 7: कार्तिक व्रती के नियम, क्या खाएँ और क्या त्यागें
अपनी कुंडली के अनुसार चैट या कॉल पर मार्गदर्शन पाएं।
अभी परामर्श करें →
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 7: कार्तिक व्रती के नियम, क्या खाएँ और क्या त्यागें
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 6: कार्तिक स्नान की पूरी विधि
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 5: व्रती की दिनचर्या और भगवान कहाँ रहते हैं
Spiritualityकार्तिक मास की कहानी: बुढ़िया माई और खिचड़ी का कटोरा
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य कथा 2026: सभी अध्याय, रोज़ का कैलेंडर और वीडियो
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 3: कार्तिक सबसे श्रेष्ठ क्यों, शंखासुर और वेद
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 1 और 2: गुणवती की कथा और सत्यभामा का पूर्वजन्म