यह कार्तिक माहात्म्य का दसवाँ अध्याय है। राजा पृथु पूछते हैं कि भगवान शिव के तेज का आगे क्या हुआ, और नारद जी उन्हें बताते हैं कि वही तेज गंगा और सागर के संगम पर एक बालक बन गया। इस अध्याय में उस बालक के जलंधर नाम पाने, ब्रह्मा जी की भविष्यवाणी, और वृंदा के साथ उसके दैत्यराज बनने की कथा है।
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नारद जी कहते हैं कि संगम पर प्रकट हुआ वह बालक इतने ज़ोर से रोया कि सारा संसार काँप उठा। लोकपाल भी व्याकुल हो गए। घबराए हुए देवता और ऋषि-मुनि ब्रह्मा जी की शरण में पहुँचे और विनती की कि प्रभु, यह बहुत बड़ा संकट है, इसे शांत कीजिए।
ब्रह्मा जी सत्यलोक से समुद्र तट पर आए। सागर ने उनका आदर किया और बालक को उनकी गोद में रख दिया। ब्रह्मा जी ने पूछा कि यह बालक किसका है। सागर ने उत्तर दिया कि प्रभु, मैं नहीं जानता, यह तो संगम पर अपने आप प्रकट हुआ है। आप ही इसका जातकर्म कीजिए और इसका भविष्य बताइए।
तभी बालक ने ब्रह्मा जी का गला कसकर पकड़ लिया और बार-बार खींचने लगा। पकड़ ऐसी कड़ी थी कि ब्रह्मा जी की आँखों से आँसू बहने लगे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने दोनों हाथों से अपने को छुड़ाया। फिर वे बोले कि इसने मेरी आँखों से जल बहा दिया है, इसलिए इसका नाम जलंधर होगा।
इसके बाद ब्रह्मा जी ने उसका भविष्य सुनाया। यह बालक जन्म लेते ही युवा हो जाएगा, सब शास्त्रों का ज्ञाता और महान योद्धा बनेगा। यह दैत्यों का राजा होगा और भगवान शिव के सिवा कोई इसे मार नहीं सकेगा। इसकी पत्नी पतिव्रता, सौभाग्यशालिनी, सुंदर, मधुर बोलने वाली और शीलवान होगी। और अंत में यह उसी स्थान पर लौट जाएगा, जहाँ से आया है।
फिर ब्रह्मा जी ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य को बुलाया। शुक्राचार्य ने जलंधर का राज्याभिषेक किया और ब्रह्मा जी अंतर्धान हो गए। सागर बहुत प्रसन्न हुआ। वह बालक को अपने घर ले गया और बड़े प्रेम से उसका पालन-पोषण किया।
समय आने पर सागर ने असुर कालनेमि को बुलाया और उसकी पुत्री वृंदा का विवाह बड़े उत्सव के साथ जलंधर से करा दिया। शुक्राचार्य के प्रभाव से जलंधर अपनी पत्नी वृंदा के साथ दैत्यों का राजा बन गया। कथा बताती है कि यही वृंदा जी आगे चलकर तुलसी जी की कथा का आधार बनती हैं।
शक्ति अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। उसका उपयोग किस दिशा में होता है, वही उसे वरदान या संकट बनाता है। जलंधर स्वयं शिवजी के तेज से जन्मा था, फिर भी उसके पहले ही रुदन से संसार काँप उठा था।
जलंधर का जन्म कहाँ हुआ?
अध्याय के अनुसार भगवान शिव का तेज गंगा और सागर के संगम पर बालक बन गया था।
उसका नाम जलंधर क्यों पड़ा?
बालक ने ब्रह्मा जी का गला इतने ज़ोर से पकड़ा कि उनकी आँखों से जल बह चला। इसी कारण ब्रह्मा जी ने उसे यह नाम दिया।
ब्रह्मा जी ने उसके बारे में क्या कहा?
यह कि वह जन्म लेते ही युवा होगा, शास्त्रों का ज्ञाता और महायोद्धा बनेगा, दैत्यों पर राज करेगा, और भगवान शिव के सिवा उसे कोई नहीं मार सकेगा। अंत में वह वहीं लौटेगा, जहाँ से आया है।
जलंधर का राज्याभिषेक किसने किया?
ब्रह्मा जी के बुलाने पर दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने उसका राज्याभिषेक किया।
जलंधर का पालन-पोषण किसने किया?
सागर उसे अपने घर ले गया और बड़े प्रेम से उसे पाला।
वृंदा जी कौन थीं?
वृंदा जी असुर कालनेमि की पुत्री थीं। सागर ने जलंधर से उनका विवाह कराया। आगे चलकर उन्हीं से तुलसी जी की कथा जुड़ती है।
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