यह कार्तिक माहात्म्य का नौवाँ अध्याय है। राजा पृथु पूछते हैं कि तुलसी जी की इतनी महिमा क्यों है, और नारद जी इसका उत्तर एक बहुत पुरानी घटना से शुरू करते हैं, जब कैलाश के मार्ग पर देवराज इन्द्र का अहंकार भगवान शिव के सामने टूटा।
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राजा पृथु ने देवर्षि नारद से पूछा कि तुलसी जी की इतनी महिमा क्यों है और वे कैसे प्रकट हुईं? नारद जी बोले कि राजन, यह कथा एक बहुत पुरानी घटना से शुरू होती है।
एक बार देवराज इन्द्र और देवगुरु बृहस्पति भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत की ओर चले। भक्तों की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव ने एक जटाधारी तपस्वी का रूप लिया और उनका रास्ता रोककर खड़े हो गए। वे शांत, ऊँचे, चौड़ी छाती वाले और तेजस्वी थे।
इन्द्र उन्हें पहचान नहीं पाए। उन्होंने पूछा कि तुम कौन हो, कहाँ से आए हो, और क्या भगवान शिव अपने स्थान पर हैं? तपस्वी चुप रहे। बार-बार पूछने पर भी उत्तर न मिला तो इन्द्र का अहंकार जाग उठा। वे बोले कि मैं तीनों लोकों का स्वामी हूँ। उत्तर दो, नहीं तो इस वज्र से तुम्हें मार दूँगा।
जैसे ही इन्द्र ने वज्र उठाया, भगवान शिव ने उनकी भुजा को वहीं जड़ कर दिया। उनकी आँखों से अग्नि जैसी ज्वाला निकलने लगी। देवगुरु बृहस्पति तुरंत पहचान गए कि ये स्वयं महादेव हैं। उन्होंने दंडवत प्रणाम करके स्तुति की कि हे दीनानाथ, हे महादेव, इन्द्र को क्षमा कीजिए।
शिवजी बोले कि जो क्रोध मेरी आँखों से बाहर आ चुका है, उसे मैं वापस कैसे रोकूँ? बृहस्पति जी ने कहा कि प्रभु, आप भक्तवत्सल हैं। इस तेज को कहीं और रख दीजिए और इन्द्र को जीवनदान दीजिए।
शिवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि बृहस्पति, तुमने इन्द्र को नया जीवन दिया है। फिर उन्होंने अपने मस्तक का वह तेज हाथ में लिया, क्षीर सागर में फेंक दिया और अंतर्धान हो गए।
इन्द्र का अहंकार टूट चुका था। दोनों अपने-अपने लोक लौट गए। पर क्षीर सागर में गिरा वह तेज यूँ ही नहीं रहा। आगे चलकर वह एक बड़ी कथा का कारण बना।
पद और शक्ति का अहंकार मत कीजिए। इन्द्र तीनों लोकों के स्वामी थे, पर एक मौन अनजान व्यक्ति को धमकाते समय यह पद उनके किसी काम नहीं आया।
अध्याय की सीख है कि हर व्यक्ति का सम्मान कीजिए, क्योंकि कौन जाने किस रूप में भगवान सामने खड़े हों। अध्याय यह भी कहता है कि विनम्रता हर संकट से बचा लेती है, और इस कथा में बृहस्पति जी की विनम्र स्तुति ने ही संकट टाला।
तुलसी जी के प्रश्न पर नारद जी यह कथा क्यों सुनाते हैं?
राजा पृथु तुलसी जी की महिमा और उनके प्रकट होने के बारे में पूछते हैं। नारद जी कहते हैं कि इसका उत्तर इसी पुरानी घटना से शुरू होता है।
भगवान शिव तपस्वी क्यों बने?
अध्याय के अनुसार भक्तों की परीक्षा लेने के लिए उन्होंने जटाधारी तपस्वी का रूप लिया।
इन्द्र के वज्र उठाने पर क्या हुआ?
शिवजी ने उनकी भुजा वहीं जड़ कर दी और उनकी आँखों से अग्नि जैसी ज्वाला निकलने लगी।
इन्द्र की रक्षा कैसे हुई?
बृहस्पति जी ने महादेव को पहचानकर प्रणाम और स्तुति की, और उनसे तेज को कहीं और रखकर इन्द्र को जीवनदान देने की प्रार्थना की।
शिवजी ने अपने तेज का क्या किया?
उन्होंने उसे मस्तक से हाथ में लेकर क्षीर सागर में फेंक दिया। अध्याय के अनुसार आगे चलकर वह एक बड़ी कथा का कारण बना।
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