यह कार्तिक माहात्म्य का ग्यारहवाँ अध्याय है। इसमें जलंधर को पता चलता है कि देवताओं ने उसके पिता सागर का मंथन करके उनके रत्न ले लिए थे। वह इन्द्र के पास दूत भेजता है, महायुद्ध छिड़ता है, देवता हारते हैं और जलंधर अमरावती में प्रवेश करता है।
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एक बार जलंधर वृंदा के साथ अपनी सभा में बैठा था। तभी दैत्यगुरु शुक्राचार्य वहाँ आए। जलंधर ने उठकर उन्हें प्रणाम किया और पूछा कि गुरुदेव, राहु का सिर किसने काटा था?
शुक्राचार्य ने बताया कि देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया था। उसमें से अनेक रत्न प्राप्त हुए और अंत में अमृत आया। जब अमृत बँट रहा था, तब राहु देवता का रूप लेकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया। तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उसका सिर काट दिया।
यह सुनते ही जलंधर की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। सागर उसके पिता थे, और देवताओं ने उन्हीं का मंथन करके उनके रत्न ले लिए थे। उसने अपने दूत घस्मर को इन्द्र के पास भेजा और कहलवाया कि तुमने मेरे पिता के रत्न क्यों छीने? सब रत्न लेकर मेरी शरण में आओ, नहीं तो तुम्हारा राज्य नष्ट कर दूँगा।
इन्द्र का उत्तर था कि सागर ने मेरे डर से पर्वतों को शरण दी थी और मेरे शत्रु दैत्यों की रक्षा की थी, इसीलिए मैंने उसके रत्न लिए। यह सुनकर जलंधर क्रोध से काँप उठा। चारों दिशाओं से और पाताल से करोड़ों दैत्य इकट्ठा हुए। शुंभ और निशुंभ जैसे सेनापति साथ आए और सेना ने इन्द्र के नंदन वन में डेरा डाल दिया। देवता भी अमरावती से युद्ध के लिए आ पहुँचे और भयंकर युद्ध छिड़ गया।
इस युद्ध में दोनों पक्षों के पास मरे हुओं को जिलाने का उपाय था। शुक्राचार्य अपनी मृत संजीवनी विद्या से दैत्यों को फिर जीवित कर देते थे। देवगुरु बृहस्पति द्रोणागिरि पर्वत की औषधियों से देवताओं को जिला देते थे। जलंधर ने यह देखा तो द्रोणागिरि को ही उखाड़कर समुद्र में फेंक दिया।
बृहस्पति जी औषधि लेने गए तो वहाँ पर्वत था ही नहीं। उन्होंने देवताओं से कहा कि अब युद्ध रोक दो, इस समय जलंधर को कोई नहीं जीत सकता। नारद जी इसका कारण बताते हैं कि इन्द्र ने पहले भगवान शिव का अपमान किया था, इसी से देवता हार गए। वे अलग-अलग दिशाओं में भागकर गुफाओं में छिप गए और जलंधर निर्भय होकर अमरावती में प्रवेश कर गया।
इस अध्याय की सीख यह है कि बड़ों और संतों का अपमान कभी व्यर्थ नहीं जाता। एक के अहंकार ने पूरे देवलोक को संकट में डाल दिया। इसलिए वाणी और व्यवहार, दोनों में सदा विनम्र रहना चाहिए।
जलंधर देवताओं से क्रोधित क्यों हुआ?
सागर उसके पिता थे। देवताओं ने उन्हीं का मंथन करके उनके रत्न ले लिए थे, इसे वह अपने पिता के साथ हुआ अन्याय मानता था।
यह सब किस प्रश्न से शुरू हुआ?
जलंधर ने शुक्राचार्य से पूछा कि राहु का सिर किसने काटा था। उसी के उत्तर में समुद्र मंथन की पूरी बात सामने आई।
इन्द्र ने दूत को क्या उत्तर दिया?
यह कि सागर ने उनके डर से पर्वतों को शरण दी थी और उनके शत्रु दैत्यों की रक्षा की थी, इसलिए उन्होंने रत्न लिए।
युद्ध में मरे हुए फिर कैसे जीवित होते थे?
दैत्यों को शुक्राचार्य अपनी मृत संजीवनी विद्या से जिलाते थे और देवताओं को बृहस्पति जी द्रोणागिरि की औषधियों से।
जलंधर ने द्रोणागिरि को समुद्र में क्यों फेंका?
उसने देखा कि उसी पर्वत की औषधियों से देवता फिर जीवित हो रहे हैं। पर्वत के हटते ही बृहस्पति जी को औषधि नहीं मिली।
नारद जी के अनुसार देवता क्यों हारे?
क्योंकि इन्द्र ने पहले भगवान शिव का अपमान किया था। नारद जी इसी को हार का कारण बताते हैं।
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Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 12 और 13: भगवान विष्णु और जलंधर का महायुद्ध
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