इस पृष्ठ पर कार्तिक माहात्म्य के बारहवें और तेरहवें अध्याय की कथा है। बारहवें अध्याय में भयभीत देवता भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं और भगवान लक्ष्मी जी को वचन देकर गरुड़ पर युद्ध के लिए चलते हैं। तेरहवें अध्याय में जलंधर से युद्ध होता है, और उसकी वीरता से प्रसन्न भगवान उसे ऐसा वर देते हैं कि उन्हें उसी के घर रहना पड़ता है।
वीडियो में सुनिए: यह अध्याय हमारे YouTube चैनल पर हिंदी में सुनें। सभी अध्यायों की सूची कार्तिक माहात्म्य कथा पृष्ठ पर है।
डर से काँपते हुए इन्द्र और सब देवता वैकुंठ पहुँचे और भगवान विष्णु की स्तुति करके रक्षा की प्रार्थना करने लगे। दया के सागर भगवान ने कहा कि डरो मत, मैं शीघ्र ही युद्ध में जलंधर का सामना करूँगा। यह कहकर वे गरुड़ पर सवार हो गए।
तभी माँ लक्ष्मी बोलीं कि प्रभु, मैं सागर की पुत्री हूँ और जलंधर मेरा भाई है। यदि मैं आपको प्रिय हूँ, तो मेरे भाई को अपने हाथों से मत मारिए। भगवान ने कहा कि प्रिये, तुम्हारे प्रेम के कारण मैं उसे अपने हाथों से नहीं मारूँगा। पर देवताओं ने मेरी स्तुति की है, इसलिए युद्ध में अवश्य जाऊँगा।
रणभूमि में भगवान के तेज से देवता सिंह की तरह गर्जना करने लगे। गरुड़ के पंखों की आँधी से दैत्य ऐसे उड़ने लगे, जैसे तूफ़ान में बादल उड़ते हैं। तेरहवाँ अध्याय यहीं से आरंभ होता है। भगवान विष्णु ने अपना सारंग धनुष उठाया और उसकी टंकार से तीनों लोक गूँज उठे। पल भर में हज़ारों दैत्य धराशायी हो गए।
फिर भगवान और जलंधर में भयंकर युद्ध हुआ। भगवान ने उसकी ध्वजा, छत्र, धनुष और बाण काट डाले। जलंधर ने गदा से गरुड़ के सिर पर प्रहार किया और एक अग्निमुख त्रिशूल चलाया। भगवान ने शिवजी के चरणों का स्मरण करके उसे अपने त्रिशूल से काट दिया। इसके बाद दोनों में बहुत देर तक मुक्कों से मल्लयुद्ध चलता रहा।
अंत में भगवान प्रसन्न होकर बोले कि दैत्यराज, तुम मेरे बड़े-बड़े अस्त्रों से भी नहीं डरे। मैं तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हूँ, कोई वर माँगो। जलंधर ने कहा कि यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरी बहन लक्ष्मी और अपने पूरे परिवार के साथ मेरे घर में निवास कीजिए। भगवान मन में दुखी हुए, पर वचन के कारण उन्होंने कहा, तथास्तु।
इस तरह भगवान विष्णु और सब देवता जलंधरपुर में रहने लगे। जलंधर ने देवताओं के सब रत्न ले लिए, निशुंभ को पाताल में बिठाया और तीनों लोकों पर राज करने लगा। आश्चर्य की बात यह है कि वह अपनी प्रजा का धर्म से, पुत्रों की तरह पालन करता था। उसके राज्य में सब सुखी थे।
इन अध्यायों से यह सीख मिलती है कि सच्ची वीरता का भगवान भी सम्मान करते हैं। रणभूमि में जलंधर शत्रु बनकर खड़ा था, फिर भी उसकी निडरता ने उसे वर का अधिकारी बना दिया।
भगवान विष्णु जलंधर से युद्ध करने क्यों गए?
इन्द्र और देवता भयभीत होकर वैकुंठ पहुँचे और रक्षा की प्रार्थना की। उन्हीं की स्तुति के कारण भगवान युद्ध में गए।
लक्ष्मी जी ने भगवान से क्या कहा?
उन्होंने कहा कि वे सागर की पुत्री हैं और जलंधर उनका भाई है, इसलिए भगवान उसे अपने हाथों से न मारें। भगवान ने यह बात मान ली।
भगवान जलंधर से क्यों प्रसन्न हुए?
जलंधर उनके बड़े-बड़े अस्त्रों से भी नहीं डरा। उसकी इसी वीरता पर प्रसन्न होकर भगवान ने वर माँगने को कहा।
जलंधर ने कौन सा वर माँगा?
उसने भगवान से कहा कि वे लक्ष्मी जी और अपने पूरे परिवार के साथ उसके घर में निवास करें।
इसके बाद जलंधर का राज कैसा था?
अध्याय के अनुसार वह तीनों लोकों पर राज करता था और प्रजा का धर्म से, पुत्रों की तरह पालन करता था। उसके राज्य में सब सुखी थे।
पिछला अध्याय: अध्याय 11: समुद्र मंथन का सच और देव-दानव युद्ध
अपनी कुंडली के अनुसार चैट या कॉल पर मार्गदर्शन पाएं।
अभी परामर्श करें →
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 11: समुद्र मंथन का सच और देव-दानव युद्ध
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 10: जलंधर का जन्म
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 9: इन्द्र का अहंकार और शिव की कृपा
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 7: कार्तिक व्रती के नियम, क्या खाएँ और क्या त्यागें
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 8: कार्तिक व्रत का उद्यापन
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 6: कार्तिक स्नान की पूरी विधि
Spiritualityकार्तिक माहात्म्य अध्याय 5: व्रती की दिनचर्या और भगवान कहाँ रहते हैं