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कार्तिक माहात्म्य अध्याय 15 और 16: कीर्तिमुख की कथा और शिव-जलंधर युद्ध

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AstroLogics
7 नवंबर 2026 · 3 मिनट पढ़ें

इस पृष्ठ पर कार्तिक माहात्म्य के पंद्रहवें और सोलहवें अध्याय की कथा है। पंद्रहवें अध्याय में जलंधर का दूत राहु कैलाश पहुँचता है और कीर्तिमुख की अद्भुत कथा आती है। सोलहवें अध्याय में जलंधर सेना लेकर कैलाश पर चढ़ाई करता है, युद्ध छिड़ता है और रुद्र के क्रोध से कृत्या प्रकट होती है।

वीडियो में सुनिए: यह अध्याय हमारे YouTube चैनल पर हिंदी में सुनें। सभी अध्यायों की सूची कार्तिक माहात्म्य कथा पृष्ठ पर है।

कथा

नारद जी के जाने के बाद जलंधर ने अपने दूत राहु को बुलाया और दुस्साहस करके उसे कैलाश भेजा, ताकि वह शिवजी से माता पार्वती को माँगे। कैलाश पर नंदी ने राहु को भीतर जाने से रोका। पर राहु अहंकार में ज़बरदस्ती सभा में घुस गया, शिवजी के सामने बैठा और जलंधर का अपमान भरा संदेश सुना दिया।

संदेश पूरा होते ही शिवजी के सामने धरती से एक भयंकर पुरुष प्रकट हुआ। उसका मुख सिंह जैसा था और उसे भयानक भूख लगी थी। वह राहु को खाने दौड़ा। राहु भागा, पर पकड़ा गया और उसने भगवान शिव की शरण माँगी। शिवजी शरण में आए को कभी नहीं त्यागते, इसलिए उन्होंने कहा कि इसे छोड़ दो।

वह पुरुष बोला कि प्रभु, मुझे बहुत भूख लगी है, मैं क्या खाऊँ? शिवजी ने कहा कि अपने ही हाथ-पैर खा लो। उसने बिना एक पल सोचे यह बात मानी और तब तक खाता रहा, जब तक उसका केवल मुख ही शेष न रहा। शिवजी उसकी इस निष्ठा से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे अपना परम प्रिय गण बनाया और नाम दिया कीर्तिमुख। तभी से कीर्तिमुख शिवजी के द्वार पर विराजते हैं और मंदिरों के द्वार पर अब भी उनका मुख बना होता है।

सोलहवाँ अध्याय राहु से शुरू होता है, जो छूटने के बाद बर्बर कहलाया। उसने जाकर जलंधर को सारी बात बताई। जलंधर कालनेमि, शुंभ और निशुंभ के साथ करोड़ों दैत्यों की सेना लेकर कैलाश की ओर चल पड़ा। चलते समय अपशकुन होने लगे। बादल घिर आए और जलंधर का मुकुट सिर से गिर पड़ा। पर अहंकार में वह रुका नहीं।

उधर देवताओं ने शिवजी से कहा कि प्रभु, भगवान विष्णु तो जलंधर के घर में रह रहे हैं। शिवजी ने विष्णु जी से पूछा। विष्णु जी बोले कि जलंधर आपका ही अंश है और लक्ष्मी का भाई है, इसलिए मैंने उसे नहीं मारा। शिवजी मुस्कुराए और बोले कि तो उसे मैं स्वयं मारूँगा।

जलंधर ने कैलाश पहुँचकर गर्जना की। शिवजी ने नंदी और अपने गणों को भेजा, गणेश जी और कार्तिकेय भी साथ थे। भयंकर युद्ध छिड़ गया। जो दैत्य मरते, उन्हें गुरु शुक्राचार्य फिर जीवित कर देते। यह सुनकर रुद्र का क्रोध भड़क उठा और उनके मुख से एक भयंकर कृत्या प्रकट हुई। उसने दैत्यों का संहार किया, दैत्यगुरु को पकड़कर अपने भीतर छिपा लिया और अंतर्धान हो गई।

गुरु के बिना दैत्यों का साहस टूट गया। शुंभ, निशुंभ और कालनेमि ने उन्हें फिर से जुटाया और नंदी, गणेश जी तथा कार्तिकेय ने फिर भयंकर आक्रमण किया।

इस अध्याय की सीख

कीर्तिमुख की कथा के अनुसार सच्ची निष्ठा और समर्पण भक्त को भगवान के सबसे निकट ले जाते हैं। जलंधर इसका उल्टा रूप दिखाता है। अहंकार चेतावनियों को भी अनदेखा कर देता है, तभी मुकुट गिरने पर भी वह नहीं रुका।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कीर्तिमुख कौन थे?
वे वही सिंह जैसे मुख वाले भयंकर पुरुष थे, जो शिवजी के सामने धरती से प्रकट हुए। शिवजी की बात मानने पर वे उनके प्रिय गण बने और यह नाम पाया।

उन्होंने अपने ही हाथ-पैर क्यों खाए?
शिवजी ने उन्हें राहु को छोड़ने को कहा था। भूख से व्याकुल होकर पूछने पर कि अब क्या खाऊँ, शिवजी ने यही कहा और उन्होंने तुरंत मान लिया।

मंदिरों के द्वार पर कीर्तिमुख का मुख क्यों बना होता है?
उनका केवल मुख ही शेष रहा था। कथा के अनुसार तभी से वे शिवजी के द्वार पर विराजते हैं और मंदिरों के द्वार पर उनका मुख बनाया जाता है।

राहु के प्राण कैसे बचे?
पकड़े जाने पर उसने भगवान शिव की शरण माँगी, और शिवजी शरण में आए को कभी नहीं त्यागते।

जलंधर ने कौन से अपशकुन अनदेखे किए?
बादल घिर आए और उसका मुकुट सिर से गिर पड़ा, फिर भी अहंकार में वह कैलाश की ओर बढ़ता रहा।

कृत्या ने क्या किया?
रुद्र के क्रोध से प्रकट हुई कृत्या ने दैत्यों का संहार किया, शुक्राचार्य को अपने भीतर छिपा लिया और अंतर्धान हो गई, जिससे दैत्यों का साहस टूट गया।

पिछला अध्याय: अध्याय 14: नारद जी और जलंधर, एक रत्न नहीं है

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