यह कार्तिक माहात्म्य का चौदहवाँ अध्याय है। इसमें देवताओं के काम के लिए भगवान शिव नारद जी को जलंधर की सभा में भेजते हैं। नारद जी कैलाश की महिमा सुनाते हैं, जलंधर के वैभव की प्रशंसा करते हैं और फिर कहते हैं कि उसके पास एक रत्न नहीं है। इसी बात से जलंधर के मन में लोभ जागता है और उसके अंत का आरंभ होता है।
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देवता बहुत दुखी थे। इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की। भक्तों की इच्छा पूरी करने वाले शिवजी ने नारद जी को बुलाया और देवताओं के काम के लिए उन्हें भेजा।
नारद जी जलंधर की सभा में पहुँचे। जलंधर ने उनके चरण धोए, आदर से बैठाया और पूछा कि देवर्षि, कहाँ से आना हुआ और मैं आपकी क्या सेवा करूँ? नारद जी बोले कि मैं कैलाश पर्वत से आ रहा हूँ। वहाँ मैंने दस हज़ार योजन में फैला मनचाहा फल देने वाले दिव्य वृक्षों का वन देखा, सैकड़ों कामधेनु गौएँ देखीं और चिंतामणि रत्नों से जगमगाता सोने का लोक देखा।
वहीं उन्होंने माता पार्वती के साथ भगवान शिव के दर्शन किए, जो त्रिनेत्र हैं, गौर वर्ण हैं और जिनके मस्तक पर चंद्रमा है। नारद जी ने कहा कि मैं सोचने लगा, क्या तीनों लोकों में कोई और इतना वैभवशाली है?
यह सुनकर जलंधर ने गर्व से नारद जी को अपना सारा वैभव दिखाया। नारद जी ने उसकी प्रशंसा की कि तुम्हारे पास ब्रह्मा जी का हंस वाला विमान है, ऐरावत हाथी है, उच्चैश्रवा घोड़ा है, दिव्य वृक्ष है और कुबेर की निधि भी है। तुम सच में तीनों लोकों के स्वामी हो।
फिर नारद जी ने वह बात कही, जिसने सब बदल दिया। वे बोले कि दैत्यराज, तुम्हारे पास एक रत्न नहीं है और उसके बिना यह सारा वैभव फीका है। जलंधर के मन में लोभ और मोह जाग उठा। उसने पूछा कि वह रत्न कहाँ है? नारद जी ने कैलाश की ओर संकेत किया, जहाँ जगदंबा पार्वती भगवान शिव के साथ विराजती हैं। अपना काम पूरा करके वे आकाश मार्ग से चले गए।
नारद जी जानते थे कि जो जगदंबा पर बुरी दृष्टि डालेगा, उसका विनाश निश्चित है। अध्याय के अनुसार यहीं से जलंधर के अंत का आरंभ हुआ।
जलंधर के पास वह सब कुछ था, जिसका नाम नारद जी ने लिया, फिर भी एक ही बात से उसका मन डोल गया। इस अध्याय की सीख है कि जो सब कुछ पाकर भी दूसरे की चीज़ पर नज़र डालता है, वह अपने ही विनाश को बुलाता है। संतोष सबसे बड़ा धन है।
नारद जी को जलंधर के पास किसने भेजा?
भगवान शिव ने। इन्द्र आदि दुखी देवताओं ने उनसे प्रार्थना की थी, तब उन्होंने नारद जी को भेजा।
नारद जी ने कैलाश पर क्या देखा था?
दस हज़ार योजन में फैला दिव्य वृक्षों का वन, सैकड़ों कामधेनु गौएँ, चिंतामणि से जगमगाता सोने का लोक, और माता पार्वती के साथ भगवान शिव।
जलंधर के पास कौन से रत्न और वैभव थे?
नारद जी ब्रह्मा जी के हंस वाले विमान, ऐरावत हाथी, उच्चैश्रवा घोड़े, दिव्य वृक्ष और कुबेर की निधि का नाम लेते हैं।
वह एक रत्न कौन सा था, जो जलंधर के पास नहीं था?
जलंधर के पूछने पर नारद जी ने कैलाश की ओर संकेत किया, जहाँ जगदंबा पार्वती भगवान शिव के साथ विराजती हैं।
नारद जी ने जलंधर से ऐसा क्यों कहा?
वे देवताओं के काम के लिए भेजे गए थे, और जानते थे कि जगदंबा पर बुरी दृष्टि डालने वाले का विनाश निश्चित है।
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