इस पृष्ठ पर कार्तिक माहात्म्य के सत्रहवें और अठारहवें अध्याय की कथा है। सत्रहवें अध्याय में जलंधर स्वयं रण में उतरकर शिवजी के बड़े-बड़े वीरों को गिरा देता है। अठारहवें अध्याय में स्वयं भगवान शंकर युद्ध में आते हैं, हारता हुआ जलंधर माया का सहारा लेता है और जगदंबा सती वृंदा के व्रत का रहस्य बताती हैं।
सभी अध्यायों की सूची कार्तिक माहात्म्य कथा पृष्ठ पर है।
शिवजी के वीर गण बहुत प्रबल थे। उन्होंने शुंभ, निशुंभ और महासुर कालनेमि को पराजित कर दिया। यह देखकर सागर-पुत्र जलंधर लंबी पताका वाले विशाल रथ पर चढ़कर स्वयं रणभूमि में आया। हाथी, घोड़े, शंख और भेरी की ध्वनि और दोनों ओर के सिंहनाद से धरती काँप उठी। उसने कुहरे जैसे बाणों से धरती से आकाश तक सब ढक दिया। नंदी को पाँच, गणेश जी को पाँच और वीरभद्र को बीस बाण मारे।
तब कार्तिकेय ने अपनी शक्ति चलाई। जलंधर मूर्छित होकर धरती पर गिरा, पर तुरंत उठकर गदा से प्रहार करने लगा। ब्रह्मा जी के वरदान का मान रखने के लिए कार्तिकेय धरती पर लेट गए। गणेश जी और नंदी भी गदा से गिरे और लोहे के भारी अस्त्र से वीरभद्र भी। यह देखकर गण रणभूमि छोड़कर शिवजी के पास भागे और लीलाधारी शिव ने उन्हें अभय दिया।
अठारहवें अध्याय में रौद्र रूप भगवान शंकर स्वयं नंदी पर चढ़कर रण में आए। उन्हें देखते ही भागे हुए गण सिंहनाद करते हुए लौट आए। जलंधर हज़ारों बाण छोड़ता हुआ शिवजी की ओर दौड़ा। शिवजी ने उसका बाण-जाल काट डाला। बलाहक, घस्मर और प्रचंड जैसे बड़े-बड़े दैत्य मारे गए और दैत्य-सेना भागने लगी।
जलंधर ने अपने दैत्यों को धिक्कारा और क्रोध में शिवजी पर सत्तर बाण चलाए। पर शिवजी ने उसकी ध्वजा, छत्र और धनुष काट दिए। जब उसने गदा उठाई, तो उसके भी टुकड़े कर दिए।
अपने को हारता देख जलंधर ने गंधर्व-माया रची। अप्सराएँ प्रकट हुईं, वीणा और मृदंग बजने लगे, नृत्य और गान होने लगा। उस लीला में गणों सहित रुद्र भी मग्न हो गए और युद्ध रुक गया।
तब जलंधर माया से शिवजी का रूप धरकर वृषभ पर बैठा और माता पार्वती के पास पहुँचा। पर जगदंबा ने उसे तुरंत पहचान लिया कि यह दानव है। वे अंतर्धान होकर उत्तर में मानसरोवर चली गईं। वहाँ उन्होंने भगवान विष्णु को बुलाकर सब बताया। विष्णु जी बोले कि माता, आपकी कृपा से मुझे सब ज्ञात है। आप जो कहेंगी, मैं वही करूँगा।
जगदंबा ने कहा कि उस दैत्य ने छल का जो मार्ग खोला है, उसी से उसका अंत होगा। जब तक सती वृंदा के व्रत का कवच है, जलंधर को कोई नहीं मार सकता। माया का उत्तर माया से ही होगा। जगदंबा का आदेश शिरोधार्य करके भगवान विष्णु जलंधर के नगर की ओर चल पड़े।
इस कथा से तीन बातें मिलती हैं। शरण में आए को भगवान सदा अभय देते हैं, जैसे शिवजी ने अपने गणों को दिया। छल कुछ समय तक जीतता दिखता है, पर उसका अंत निश्चित है।
और अध्याय के अनुसार एक सती के व्रत में इतनी शक्ति है कि देवता भी उसका मान रखते हैं।
कार्तिकेय रणभूमि में धरती पर क्यों लेट गए?
अध्याय के अनुसार उन्होंने ब्रह्मा जी के वरदान का मान रखने के लिए ऐसा किया।
गण भागकर आए तो शिवजी ने क्या किया?
उन्होंने गणों को अभय दिया और स्वयं नंदी पर चढ़कर रण में आए। उन्हें देखकर गण लौट आए।
गंधर्व-माया क्या थी?
हारते हुए जलंधर ने अप्सराएँ प्रकट कीं और संगीत, नृत्य और गान शुरू करा दिया। रुद्र और गण उसमें मग्न हो गए और युद्ध रुक गया।
जगदंबा ने जलंधर के छल का क्या उत्तर दिया?
उन्होंने उसे तुरंत पहचान लिया, अंतर्धान होकर मानसरोवर चली गईं और वहाँ भगवान विष्णु को बुलाया।
जलंधर को कोई क्यों नहीं मार पा रहा था?
जगदंबा बताती हैं कि सती वृंदा का व्रत उसके लिए कवच था। जब तक वह कवच था, उसे कोई नहीं मार सकता था।
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