श्री दुर्गा और महाकाली को एक साथ पुकारने वाली अंबे तू है जगदम्बे काली आरती (कहीं-कहीं अम्बे तू है जगदम्बे काली भी लिखी जाती है) घर-घर में गाई जाती है। इसकी पहली पंक्ति जय दुर्गे खप्पर वाली है। इस पृष्ठ पर आपको मिलेगी संपूर्ण आरती — पूरे हिन्दी लिरिक्स, अंग्रेज़ी उच्चारण, हर पंक्ति का अर्थ, पाठ के लाभ, तथा नवरात्रि और चतुर्दशी की पूजा विधि।
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गाएँ भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
तेरे भक्त जनों पर माता, भीड़ पड़ी है भारी।
दानव-दल पर टूट पड़ो माँ, करके सिंह सवारी॥
सौ-सौ सिंहों से है बलशाली, है अष्टभुजाओं वाली।
दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
माँ-बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत कपूत सुने हैं पर ना, माता सुने न कुमाता॥
सब पर करुणा बरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली।
दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
नहीं माँगते धन और दौलत, न चाँदी न सोना।
हम तो माँगें माँ, तेरे मन में एक छोटा-सा कोना॥
सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली।
सतियों के सत को सँवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
चौदस के दिन तेरे भवन पे, भीड़ लगे है भारी।
जो कोई माँगे सोई मिलता, कहती दुनिया सारी॥
मैया तू है देने वाली, ना कोई आवे खाली।
भक्तों के कारज तू ही सारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गाएँ भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
Ambe tu hai Jagdambe Kali, Jai Durge Khappar Waali.
Tere hi gun gaen Bharati, o Maiya hum sab utaaren teri aarti.
Tere bhakt janon par Maata, bheed padi hai bhaari.
Daanav-dal par toot pado Maan, karke sinh savaari.
Nahin maangte dhan aur daulat, na chaandi na sona.
Hum to maange Maan, tere man mein ek chhota-sa kona.
Chaudas ke din tere bhavan pe, bheed lage hai bhaari.
Jo koi maange soi milata, kahati duniya saari.
पहली ही पंक्ति में माँ को जगदम्बे अर्थात् समस्त जगत की माता कहा गया है, और उसी साँस में काली — जो खप्पर धारण करती हैं। यह जोड़ शाक्त परंपरा का मूल भाव है: दुर्गा और काली दो अलग देवियाँ नहीं, एक ही शक्ति के दो स्वरूप हैं। माँ जगदम्बे स्तुति में यही भाव और विस्तार से मिलता है।
आरती का सबसे मार्मिक अंश वह है जहाँ भक्त कहता है कि उसे धन-दौलत, चाँदी-सोना कुछ नहीं चाहिए — बस माँ के मन में एक छोटा-सा कोना चाहिए। पूरी रचना में यही एक याचना है, और वही इसका भाव तय करती है।
पुराणों के अनुसार रक्तबीज के वध के समय माँ दुर्गा के तीसरे नेत्र से काली प्रकट हुईं। इसीलिए इस आरती में दोनों नाम साथ आते हैं। काली का स्वरूप भयकारी अवश्य है, पर वह भय असुरों के लिए है, भक्तों के लिए नहीं — भक्त के लिए वही माँ है। महाकाली की आरती में यह रूप और स्पष्ट होता है।
मंगलवार और शनिवार माँ काली को प्रिय हैं, इसलिए इन दिनों इस आरती का पाठ विशेष माना जाता है। चतुर्दशी तिथि को इसका महत्व सर्वाधिक है — आज की तिथि आज का पंचांग पर देखी जा सकती है। नवरात्रि में अष्टमी और नवमी की संध्या आरती इसके लिए सबसे उपयुक्त समय है।
नवरात्रि के नौ दिनों में एक ही माँ के नौ स्वरूपों की उपासना होती है, इसलिए यह आरती इन दिनों की संध्या पूजा में सहज बैठती है। दिन-विशेष की आरतियाँ भी साथ पढ़ी जाती हैं:
दोनों की। पहली ही पंक्ति में अम्बे (दुर्गा) और काली दोनों नाम साथ आते हैं। शाक्त परंपरा में ये एक ही शक्ति के दो स्वरूप माने जाते हैं, इसलिए आरती दोनों को एक साथ संबोधित करती है।
चंद्र मास की चौदहवीं तिथि (चतुर्दशी) को देवी की शक्ति प्रबल मानी जाती है। "चौदस के दिन तेरे भवन पे, भीड़ लगे है भारी" पंक्ति इसी परंपरा की ओर संकेत करती है कि उस दिन दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ रहती है।
हाँ। इसकी भाषा सरल आधुनिक हिन्दी है और भाव सीधा है, इसलिए यह नए साधकों के लिए सबसे सुलभ आरतियों में से एक मानी जाती है। किसी दीक्षा या विशेष नियम की आवश्यकता नहीं।
दोनों प्रचलित हैं। "अम्बे" में संयुक्ताक्षर है और "अंबे" में अनुस्वार; उच्चारण एक ही रहता है। पुस्तकों में प्रायः अम्बे मिलता है, जबकि इंटरनेट पर खोजते समय लोग अधिकतर अंबे लिखते हैं।
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ममता और रौद्र रूप — इस आरती में माँ के दो स्वरूप
इस आरती की विशेषता यह है कि यह एक ही साँस में देवी के दोनों रूपों को पुकारती है — पालन करने वाली अम्बा भी, और अज्ञान का नाश करने वाली काली भी। भक्त इसे विरोधाभास नहीं मानते; यही माँ का सबसे गहरा सत्य है कि जो गोद बालक को थामती है, वही आवश्यकता पड़ने पर उसके लिए युद्ध भी करती है।
यह आरती नवरात्रि में, विशेषकर अष्टमी और नवमी तिथि को, तथा काली मंदिरों में रात्रि की संध्या पूजा के समय गाई जाती है।