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दुर्गा सप्तशती प्रथम अध्याय: मधु-कैटभ वध, संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

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Astro Logics Admin
12 अक्टूबर 2026 · 22 मिनट पढ़ें
दुर्गा सप्तशती प्रथम अध्याय: मधु-कैटभ वध, संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

दुर्गा सप्तशती का पहला अध्याय, यानी प्रथम अध्याय, वह स्थान है जहाँ से चण्डी पाठ आरम्भ होता है। इसी से प्रथम चरित्र खुलता है, देवीमाहात्म्य के तीन चरित्रों में पहला, जिसकी अधिष्ठात्री महाकाली हैं। मानक गणना में इस अध्याय में 104 श्लोक हैं। नीचे पूरा अध्याय दिया गया है: विनियोग, ध्यान और हर श्लोक संस्कृत में, और हर श्लोक के बाद उसका अर्थ, ताकि इसे पाठ के रूप में भी पढ़ा जा सके और श्लोक-दर-श्लोक समझा भी जा सके।

कथा का ढाँचा भी यहीं से शुरू होता है। राज्य खो चुके एक राजा और अपने ही परिवार से निकाले गए एक वैश्य की भेंट वन के एक आश्रम में होती है, और वे मेधा ऋषि से वह प्रश्न पूछते हैं जो आज भी हमारा है: जिसने दुख दिया, मन उसी से क्यों चिपका रहता है? ऋषि उत्तर में महामाया का परिचय देते हैं और उनके पहले चरित्र की कथा कहते हैं, जिसमें मधु और कैटभ के वध के लिए विष्णु को जगाया गया। इस अध्याय में ब्रह्मा जी द्वारा की गई देवी की स्तुति (श्लोक 73 से 87) सप्तशती की चार प्रमुख स्तुतियों में से एक है।

यह अध्याय सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ, सभी 13 अध्याय और अंग पाठ-क्रम में का भाग है।

अध्याय 1 एक नज़र में

  • अध्याय: 13 में पहला, "मधु-कैटभ वध" (Madhu Kaitabha Vadha)
  • चरित्र: प्रथम चरित्र
  • अधिष्ठात्री देवी: महाकाली
  • ऋषि: ब्रह्मा
  • छन्द: गायत्री
  • शक्ति · बीज · तत्त्व · वेद: नन्दा · रक्तदन्तिका · अग्नि · ऋग्वेद
  • श्लोक: मानक गणना में 104 (उवाच पंक्तियाँ गिनी गई हैं)
  • पाठ का पारम्परिक फल: परंपरा में पहला अध्याय हर प्रकार की चिंता और व्याकुलता से मुक्ति के लिए पढ़ा जाता है, और यह किसी भी सम्पूर्ण सप्तशती पाठ का आरम्भ है।

अध्याय 1 की कथा संक्षेप में

मार्कण्डेय जी आठवें मनु सावर्णि की कथा और महामाया की कृपा से उनके मनु बनने का वृत्तान्त सुनाने का वचन देकर कथा आरम्भ करते हैं। स्वारोचिष मन्वन्तर में चैत्र वंश के राजा सुरथ कोलाविध्वंसियों से हार जाते हैं, उनके अपने मंत्री उनका धन और सेना छीन लेते हैं, और वे अकेले वन में निकलकर मेधा ऋषि के आश्रम पहुँचते हैं। वहाँ उनकी भेंट समाधि नाम के वैश्य से होती है, जिसे उसकी पत्नी और पुत्रों ने धन के लिए घर से निकाल दिया है। दोनों की पीड़ा एक ही है: जिन्होंने ठुकराया, उन्हीं से अब भी प्रेम है। ऋषि समझाते हैं कि यह महामाया का प्रभाव है, जो विष्णु की योगनिद्रा हैं, जो ज्ञानियों के मन को भी ममता में खींच लेती हैं, और प्रसन्न होने पर वही मुक्ति भी देती हैं। वे कौन हैं, यह पूछे जाने पर ऋषि उनका पहला चरित्र सुनाते हैं। कल्प के अन्त में, जब सब कुछ एक समुद्र था और विष्णु सो रहे थे, उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के असुर उत्पन्न होकर ब्रह्मा को मारने चले। ब्रह्मा ने योगनिद्रा की स्तुति की; वे विष्णु के शरीर से बाहर आईं, विष्णु जागे, पाँच हजार वर्ष उन दोनों से लड़े, और जब मोहित असुरों ने उन्हें वर देना चाहा, तो उन्होंने उन्हीं का वध माँग लिया। असुरों ने कहा कि हमें वहाँ मारो जहाँ पृथ्वी जल में डूबी न हो; भगवान् ने उन्हें अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से उनके सिर काट दिए।

दुर्गा सप्तशती अध्याय 1: संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

संस्कृत पाठ देवीमाहात्म्य के मानक पाठ के अनुसार है; श्लोक-संख्या सामान्य 700 श्लोकों वाली गणना है, जिसमें उवाच पंक्तियाँ भी गिनी जाती हैं। हर श्लोक के बाद उसका अर्थ सरल हिंदी में दिया गया है।

विनियोग

अस्य श्री प्रथमचरित्रस्य । ब्रह्मा ऋषिः ।
महाकाली देवता । गायत्री छन्दः । नन्दा शक्तिः ।
रक्तदन्तिका बीजम् । अग्निस्तत्त्वम् ।
ऋग्वेदः स्वरूपम् । श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे
प्रथमचरित्रजपे विनियोगः ।

अर्थ: इस प्रथम चरित्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, देवता महाकाली, छन्द गायत्री, शक्ति नन्दा, बीज रक्तदन्तिका, तत्त्व अग्नि और स्वरूप ऋग्वेद है। श्रीमहाकाली की प्रसन्नता के लिए इस प्रथम चरित्र के जप में इसका विनियोग है।

ध्यान

ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं सन्दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् ।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

अर्थ: ॐ। मैं उन महाकाली का ध्यान करता हूँ जो अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डी, कटा हुआ मस्तक और शंख धारण करती हैं; जिनके तीन नेत्र हैं, जिनका हर अंग आभूषणों से सजा है, जिनकी कान्ति नीलमणि जैसी है, जिनके दस मुख और दस चरण हैं, और जिनकी स्तुति कमल से जन्मे ब्रह्मा ने इसलिए की थी कि हरि के सोते हुए मधु और कैटभ का वध हो सके। ॐ, चण्डिका को नमस्कार।

श्लोक 1 से 104

ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच ॥१॥

अर्थ: ॐ ऐं। मार्कण्डेय जी बोले:

सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद्गदतो मम ॥२॥

अर्थ: सूर्य के पुत्र सावर्णि आठवें मनु कहे जाते हैं। उनकी उत्पत्ति की कथा मैं विस्तार से कहता हूँ, सुनो।

महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः ।
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥३॥

अर्थ: सुनो, सूर्य के पुत्र वे महाभाग सावर्णि महामाया के प्रभाव से किस प्रकार मन्वन्तर के अधिपति हुए।

स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः ।
सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥४॥

अर्थ: पहले स्वारोचिष मन्वन्तर में चैत्र वंश में उत्पन्न सुरथ नाम के एक राजा थे, जिनका सारी पृथ्वी पर राज्य था।

तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥५॥

अर्थ: वे अपनी प्रजा का अपने पुत्रों की तरह न्यायपूर्वक पालन करते थे, तभी कोलाविध्वंसी नाम के राजा उनके शत्रु हो गए।

तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः ।
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥६॥

अर्थ: प्रबल दण्डनीति वाले उन राजा का उनसे युद्ध हुआ, और संख्या में कम होने पर भी उन कोलाविध्वंसियों ने उन्हें युद्ध में हरा दिया।

ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् ।
आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥७॥

अर्थ: तब वे अपने नगर लौट आए और केवल अपने देश के ही राजा रह गए; पर वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उन महाभाग राजा पर आक्रमण कर दिया।

अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः ।
कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥८॥

अर्थ: वहाँ अपने ही नगर में, बलवान, दुष्ट और दुरात्मा मंत्रियों ने दुर्बल हो चुके राजा का खजाना और सेना छीन ली।

ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः ।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥९॥

अर्थ: तब राज्य से वंचित वे राजा शिकार के बहाने अकेले घोड़े पर सवार होकर घने वन में चले गए।

स तत्राश्रममद्राक्षीद्द्विजवर्यस्य मेधसः ।
प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥१०॥

अर्थ: वहाँ उन्होंने द्विजश्रेष्ठ मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ हिंसक पशु भी शान्त भाव से रहते थे और जो मुनि के शिष्यों से सुशोभित था।

तस्थौ कञ्चित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः ।
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन् मुनिवराश्रमे ॥११॥

अर्थ: उस मुनि से सत्कार पाकर वे कुछ समय वहीं रहे और उस मुनिवर के आश्रम में इधर-उधर विचरते रहे।

सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टमानसः ।
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ॥१२॥

अर्थ: वहाँ ममता से खिंचे मन से वे सोचने लगे: "मेरे पूर्वजों द्वारा पालित वह नगर अब मुझसे छूट गया है।"

मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा ।
न जाने स प्रधानो मे शूरो हस्ती सदामदः ॥१३॥

अर्थ: "क्या मेरे वे दुराचारी सेवक उसका धर्मपूर्वक पालन कर रहे हैं या नहीं? मैं नहीं जानता। मेरा वह सदा मदमत्त रहने वाला वीर प्रधान हाथी..."

मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते ।
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ॥१४॥

अर्थ: "...मेरे शत्रुओं के वश में चला गया है; अब उसे कौन से भोग मिलेंगे? और जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन के लिए सदा मेरे पीछे चलते थे..."

अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ।
असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम् ॥१५॥

अर्थ: "...वे अब निश्चय ही दूसरे राजाओं की सेवा कर रहे होंगे। उन अपव्ययी लोगों के लगातार खर्च करने से..."

सञ्चितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ॥१६॥

अर्थ: "...मेरा बड़े कष्ट से जोड़ा हुआ खजाना नष्ट हो जाएगा।" राजा इसी तरह की और भी बातें निरन्तर सोचते रहे।

तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः ।
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः ॥१७॥

अर्थ: वहाँ ब्राह्मण के आश्रम के पास उन्होंने एक वैश्य को देखा और पूछा: "आप कौन हैं और यहाँ आने का कारण क्या है?"

सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् ॥१८॥

अर्थ: "आप शोकग्रस्त और उदास मन वाले क्यों दिखाई देते हैं?" राजा के प्रेमपूर्वक कहे इन वचनों को सुनकर...

प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥१९॥

अर्थ: ...वह वैश्य विनय से झुककर राजा से बोला।

वैश्य उवाच ॥२०॥

अर्थ: वैश्य बोला:

समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ॥२१॥

अर्थ: "मैं समाधि नाम का वैश्य हूँ, धनी कुल में उत्पन्न हुआ हूँ।"

पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ।
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ॥२२॥

अर्थ: "धन के लोभ से मेरे दुष्ट पुत्रों और पत्नी ने मुझे निकाल दिया है; वे मेरा धन लेकर मुझे धन, पत्नी और पुत्रों से हीन कर गए।"

वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः ।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् ॥२३॥

अर्थ: "अपने ही विश्वस्त बन्धुओं से निकाला जाकर मैं दुखी होकर वन में आया हूँ। यहाँ रहते हुए मुझे पता नहीं कि मेरे पुत्र कुशल से हैं या नहीं..."

प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः ।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥२४॥

अर्थ: "...न यह कि मेरे स्वजन और पत्नी किस दशा में हैं। इस समय उनके घर में क्षेम है या अक्षेम?"

कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥२५॥

अर्थ: "वे कैसे हैं? मेरे पुत्र सदाचारी हैं या दुराचारी हो गए हैं?"

राजोवाच ॥२६॥

अर्थ: राजा बोले:

यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥२७॥

अर्थ: "जिन लोभी पुत्रों, पत्नी आदि ने धन के लिए आपको निकाल दिया..."

तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥२८॥

अर्थ: "...उन्हीं में आपका मन स्नेह से क्यों बँधा है?"

वैश्य उवाच ॥२९॥

अर्थ: वैश्य बोला:

एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः ॥३०॥

अर्थ: "आपने मेरे विषय में जो कहा, वह ठीक वैसा ही है।"

किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ।
यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ॥३१॥

अर्थ: "किन्तु क्या करूँ? मेरा मन कठोर नहीं होता। जिन्होंने धन के लोभ में पिता का प्रेम छोड़कर मुझे निकाल दिया..."

पतिस्वजनहार्दं च हार्दितेष्वेव मे मनः ।
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥३२॥

अर्थ: "...और पति तथा स्वजन का हार्दिक सम्बन्ध भी त्याग दिया, उन्हीं में मेरा मन कोमल है। हे महामते, यह जानते हुए भी मैं इसे समझ नहीं पाता।"

यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु ।
तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥३३॥

अर्थ: "गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी मेरा चित्त प्रेम से क्यों झुका रहता है? उन्हीं के लिए मेरी साँसें भारी होती हैं और मन उदास रहता है।"

करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥३४॥

अर्थ: "मैं क्या करूँ, जब उन प्रेमहीन लोगों के प्रति भी मेरा मन कठोर नहीं होता?"

मार्कण्डेय उवाच ॥३५॥

अर्थ: मार्कण्डेय जी बोले:

ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ॥३६॥

अर्थ: हे ब्राह्मण, तब वे दोनों, समाधि नाम का वैश्य और वे श्रेष्ठ राजा, साथ मिलकर उस मुनि के पास गए।

समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः ।
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् ॥३७॥

अर्थ: यथोचित विनय और सम्मान के साथ उनसे बातचीत करके, वैश्य और राजा वहाँ बैठ गए और वार्तालाप करने लगे।

उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥३८॥

अर्थ: वहाँ बैठे हुए वैश्य और राजा ने कुछ और बातें कीं।

राजोवाच ॥३९॥

अर्थ: राजा बोले:

भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥४०॥

अर्थ: "भगवन्, मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ; कृपया उसका उत्तर दीजिए।"

दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना ।
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥४१॥

अर्थ: "मेरा मन मेरे वश में नहीं है, इसी से मुझे दुख है। राज्य खो देने पर भी राज्य के हर अंग में मेरी ममता बनी हुई है..."

जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम ।
अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥४२॥

अर्थ: "...जानते हुए भी अज्ञानी की तरह। हे मुनिश्रेष्ठ, यह क्या है? और यह व्यक्ति अपने पुत्रों, पत्नी और सेवकों से अपमानित और त्यागा हुआ है..."

स्वजनेन च सन्त्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति ।
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥४३॥

अर्थ: "...अपने ही लोगों ने इसे छोड़ दिया है, फिर भी इसका मन उन्हीं में अत्यन्त आसक्त है। इस प्रकार यह और मैं दोनों अत्यन्त दुखी हैं..."

दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥४४॥

अर्थ: "...जिन विषयों के दोष हम देख चुके हैं, उन्हीं में ममता से हमारा मन खिंचा रहता है। हे महाभाग, यह क्या है कि जानने वालों को भी ऐसा मोह होता है?"

ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥४५॥

अर्थ: "विवेक से अन्धी यह मूढ़ता मुझे और इसे, दोनों को हो रही है।"

ऋषिरुवाच ॥४६॥

अर्थ: ऋषि बोले:

ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे ॥४७॥

अर्थ: "हर प्राणी को इन्द्रियों की पहुँच के विषयों का ज्ञान होता है।"

विषयाश्च महाभाग यान्ति चैवं पृथक्पृथक् ।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे ॥४८॥

अर्थ: "हे महाभाग, विषय हर प्राणी तक अलग-अलग तरह से पहुँचते हैं। कुछ प्राणी दिन में अन्धे होते हैं, कुछ रात में..."

केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥४९॥

अर्थ: "...और कुछ दिन-रात समान रूप से देखते हैं। यह सच है कि मनुष्य ज्ञानी हैं, पर केवल वे ही नहीं।"

यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः ।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम् ॥५०॥

अर्थ: "क्योंकि पशु, पक्षी और मृग आदि सभी ज्ञानी हैं; जो ज्ञान मनुष्यों में है, वही उन पशु-पक्षियों में भी है।"

मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः ।
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु ॥५१॥

अर्थ: "जो उनमें है, वह मनुष्यों में भी है; शेष दोनों में समान है। ज्ञान होते हुए भी देखो, ये पक्षी..."

कणमोक्षादृतान् मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा ।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति ॥५२॥

अर्थ: "...स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी मोहवश अपने बच्चों की चोंच में दाने डालते हैं। हे नरव्याघ्र, क्या तुम नहीं देखते कि मनुष्य अपनी सन्तान के लिए लालायित रहते हैं..."

लोभात् प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि ।
तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः ॥५३॥

अर्थ: "...लोभवश, बदले में कुछ पाने की आशा से? फिर भी वे ममता के भँवर और मोह के गड्ढे में गिराए जाते हैं..."

महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा ।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः ॥५४॥

अर्थ: "...संसार की स्थिति बनाए रखने वाली महामाया के प्रभाव से। इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। वे जगत्पति की योगनिद्रा हैं..."

महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥५५॥

अर्थ: "...हरि की महामाया हैं, और उन्हीं से यह जगत मोहित होता है। वे भगवती देवी ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर..."

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ॥५६॥

अर्थ: "...मोह में डाल देती हैं। उन्हीं से यह चराचर विश्व रचा जाता है।"

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ॥५७॥

अर्थ: "प्रसन्न होने पर वे वर देती हैं और मनुष्यों की मुक्ति का कारण बनती हैं। वे ही परा, सनातन विद्या हैं, मुक्ति की हेतुभूता..."

संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥५८॥

अर्थ: "...और वे ही संसार-बन्धन का कारण भी हैं; वे समस्त ईश्वरों की भी ईश्वरी हैं।"

राजोवाच ॥५९॥

अर्थ: राजा बोले:

भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान् ॥६०॥

अर्थ: "भगवन्, वे देवी कौन हैं जिन्हें आप महामाया कहते हैं?"

ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज ।
यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥६१॥

अर्थ: "हे ब्राह्मण, वे कैसे प्रकट हुईं, उनका कार्य क्या है? उनका प्रभाव क्या है, स्वरूप क्या है और उनका उद्भव कहाँ से हुआ?"

तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥६२॥

अर्थ: "हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, यह सब मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।"

ऋषिरुवाच ॥६३॥

अर्थ: ऋषि बोले:

नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥६४॥

अर्थ: "वे नित्य हैं, जगत् उन्हीं का रूप है; उन्हीं से यह सब व्याप्त है।"

तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ॥६५॥

अर्थ: "फिर भी वे अनेक प्रकार से प्रकट होती हैं; यह मुझसे सुनो। जब वे देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होती हैं..."

उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ॥६६॥

अर्थ: "...तब नित्य होने पर भी लोक में वे उत्पन्न हुईं कही जाती हैं। कल्प के अन्त में, जब सारा जगत् एक समुद्र बन गया था, भगवान् विष्णु योगनिद्रा में..."

आस्तीर्य शेषमभजत् कल्पान्ते भगवान् प्रभुः ।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥६७॥

अर्थ: "...शेषनाग की शय्या बिछाकर सो रहे थे। तब दो भयंकर असुर, प्रसिद्ध मधु और कैटभ..."

विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥६८॥

अर्थ: "...विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न होकर ब्रह्मा को मारने के लिए उद्यत हुए। विष्णु के नाभि-कमल पर बैठे प्रजापति ब्रह्मा ने..."

दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयः स्थितः ॥६९॥

अर्थ: "...उन दोनों उग्र असुरों को और सोए हुए जनार्दन को देखकर, एकाग्र हृदय से योगनिद्रा की स्तुति की..."

विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥७०॥

अर्थ: "...ताकि हरि जाग उठें, उन योगनिद्रा की जो हरि के नेत्रों में निवास करती हैं, जो विश्वेश्वरी, जगद्धात्री और स्थिति तथा संहार करने वाली हैं..."

निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥७१॥

अर्थ: "...जो भगवान् विष्णु की अतुलनीय तेजोमयी भगवती निद्रा हैं; इस प्रकार प्रभु ब्रह्मा ने उनकी स्तुति की।"

ब्रह्मोवाच ॥७२॥

अर्थ: ब्रह्मा जी बोले:

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ॥७३॥

अर्थ: "तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा हो, तुम ही वषट्कार हो, और स्वर तुम्हारा ही स्वरूप है।"

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ।
अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्याविशेषतः ॥७४॥

अर्थ: "हे अक्षरे, हे नित्ये, तुम ही सुधा हो; तुम तीन मात्राओं के रूप में स्थित हो, और उस नित्य अर्धमात्रा के रूप में भी, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं हो सकता।"

त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत् सृज्यते जगत् ॥७५॥

अर्थ: "तुम ही सन्ध्या हो, सावित्री हो, और हे देवि, तुम ही परम जननी हो। तुम्हीं से यह विश्व धारण किया जाता है, तुम्हीं से यह जगत् रचा जाता है..."

त्वयैतत् पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥७६॥

अर्थ: "...हे देवि, तुम्हीं से इसका पालन होता है और अन्त में तुम ही सदा इसे अपने में समेट लेती हो। सृष्टि के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन में स्थितिरूपा..."

तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥७७॥

अर्थ: "...और इस जगत् के अन्त में संहाररूपा हो, हे जगन्मयी। तुम महाविद्या, महामाया, महामेधा और महास्मृति हो..."

महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी ।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥७८॥

अर्थ: "...महामोहा, महादेवी और महेश्वरी हो। तुम सबकी प्रकृति हो, तीनों गुणों को प्रकट करने वाली।"

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ।
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥७९॥

अर्थ: "तुम कालरात्रि, महारात्रि और दारुण मोहरात्रि हो। तुम श्री हो, ईश्वरी हो, ह्री (लज्जा) हो, और बोध-लक्षण वाली बुद्धि हो।"

लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥८०॥

अर्थ: "तुम लज्जा, पुष्टि और तुष्टि हो, तुम शान्ति और क्षमा हो। खड्ग, शूल, गदा और चक्र धारण करने वाली तुम घोर रूपा हो..."

शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥८१॥

अर्थ: "...शंख, धनुष, बाण, भुशुण्डी और परिघ तुम्हारे आयुध हैं। तुम सौम्य हो, सौम्यतर हो, और समस्त सौम्य वस्तुओं से भी अधिक अत्यन्त सुन्दर हो।"

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।
यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥८२॥

अर्थ: "तुम पर और अपर सबसे परे परमेश्वरी हो। जो कुछ भी कहीं सत् या असत् वस्तु है, हे सर्वात्मिके..."

तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे मया ।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ॥८३॥

अर्थ: "...उस सबकी जो शक्ति है, वह तुम ही हो; फिर मैं तुम्हारी स्तुति कैसे करूँ? जब स्वयं जगत् के रचयिता, पालक और संहारक..."

सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ।
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥८४॥

अर्थ: "...को तुमने निद्रा के वश में कर दिया है, तब यहाँ कौन तुम्हारी स्तुति करने में समर्थ है? विष्णु, मैं और शिव, हम सबको तुमने ही शरीर धारण कराया है..."

कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥८५॥

अर्थ: "...फिर तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें हो सकती है? हे देवि, ऐसी तुम, अपने ही उदार प्रभावों से स्तुत होकर..."

मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥८६॥

अर्थ: "...इन दोनों दुर्धर्ष असुरों, मधु और कैटभ, को मोहित कर दो और जगत् के स्वामी अच्युत को शीघ्र जगा दो..."

बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥८७॥

अर्थ: "...और उनमें इन दोनों महान् असुरों को मारने की बुद्धि उत्पन्न करो।"

ऋषिरुवाच ॥८८॥

अर्थ: ऋषि बोले:

एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ॥८९॥

अर्थ: "विधाता के इस प्रकार स्तुति करने पर, तामसी देवी ने, विष्णु को जगाने और मधु-कैटभ के वध के लिए..."

विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ ।
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥९०॥

अर्थ: "...भगवान् विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, भुजाओं, हृदय और वक्षःस्थल से निकलकर..."

निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः ॥९१॥

अर्थ: "...अव्यक्त से जन्मे ब्रह्मा के सामने आ खड़ी हुईं। उनसे मुक्त होकर जगन्नाथ जनार्दन उठ बैठे..."

एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ ।
मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ॥९२॥

अर्थ: "...उस एकार्णव में अपनी शेष-शय्या से, और उन्होंने उन दोनों दुरात्मा, अत्यन्त बलशाली और पराक्रमी मधु और कैटभ को देखा..."

क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ।
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ॥९३॥

अर्थ: "...जिनकी आँखें क्रोध से लाल थीं और जो ब्रह्मा को खा जाने पर तुले थे। तब भगवान् हरि उठकर उनसे युद्ध करने लगे..."

पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः ।
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ ॥९४॥

अर्थ: "...पाँच हजार वर्षों तक, वे विभु अपनी भुजाओं को ही शस्त्र बनाकर लड़ते रहे। और वे दोनों, अपने अति बल से उन्मत्त और महामाया से मोहित होकर..."

उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम् ॥९५॥

अर्थ: "...केशव से बोले: "हमसे कोई वर माँग लो।""

श्रीभगवानुवाच ॥९६॥

अर्थ: श्रीभगवान् बोले:

भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ॥९७॥

अर्थ: "यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो, तो अब तुम दोनों मेरे हाथों मारे जाओ।"

किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मया ॥९८॥

अर्थ: "किसी और वर से क्या प्रयोजन? मैंने इतना ही माँगा है।"

ऋषिरुवाच ॥९९॥

अर्थ: ऋषि बोले:

वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ॥१००॥

अर्थ: "इस प्रकार छले जाने पर उन दोनों ने देखा कि सारा जगत् जल से भरा है..."

विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः ।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥१०१॥

अर्थ: "...और कमलनयन भगवान् से बोले: "हमें वहाँ मारो जहाँ पृथ्वी जल में डूबी न हो।""

ऋषिरुवाच ॥१०२॥

अर्थ: ऋषि बोले:

तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता ।
कृत्वा चक्रेण वै छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥१०३॥

अर्थ: ""ऐसा ही हो," कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् ने उन दोनों को अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से उनके सिर काट दिए।"

एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम् ।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः श‍ृणु वदामि ते ॥१०४॥

अर्थ: "इस प्रकार वे देवी प्रकट हुईं, और स्वयं ब्रह्मा ने उनकी स्तुति की। अब आगे मैं तुम्हें इन देवी का प्रभाव सुनाता हूँ, सुनो।"

। ऐं ॐ ।
॥ स्वस्ति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
उवाच १४, अर्धश्लोकाः २४, श्लोकाः ६६, एवमादितः ॥ १०४॥

अर्थ: इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण के सावर्णिक मन्वन्तर में देवीमाहात्म्य का मधु-कैटभ वध नामक पहला अध्याय पूरा हुआ। चौदह उवाच, चौबीस अर्धश्लोक और छियासठ श्लोक: कुल एक सौ चार।

अध्याय 1 के पाठ का महत्त्व और लाभ

सप्तशती की साधना में अध्याय केवल कथा नहीं हैं, बल्कि आवाहनों का एक क्रम हैं, और परंपरा हर अध्याय का एक फल बताती है। पहला अध्याय हर प्रकार की चिंता और व्याकुलता से राहत के लिए पढ़ा जाता है, जो इसके विषय से मेल खाता है: राजा और वैश्य ऋषि के पास इसीलिए आते हैं कि उनका मन शान्त नहीं होता। यह सम्पूर्ण चण्डी पाठ का, नवरात्रि के नवाह्न (नौ दिन के) पाठ का, और अकेले पढ़े जाने वाले प्रथम चरित्र का भी स्वाभाविक आरम्भ है।

इसके दो अंश विशेष महत्त्व रखते हैं। महामाया पर ऋषि का उपदेश (श्लोक 47 से 58) सप्तशती का दार्शनिक हृदय है: जो शक्ति जगत् को ममता में बाँधती है, वही उसे मुक्त भी करती है। और ब्रह्मा स्तुति (श्लोक 73 से 87), जिसमें देवी को स्वाहा, स्वधा, ॐ की अर्धमात्रा, सन्ध्या, सावित्री, महाविद्या और महामाया कहकर पुकारा गया है, अनेक भक्त अलग से भी पढ़ते हैं, समस्त ध्वनि और समस्त सत्ता के आधार के रूप में माँ की स्तुति के लिए।

अध्याय 1 कैसे पढ़ें (विधि)

सम्पूर्ण सप्तशती पाठ में अध्याय तीनों अंगों, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र, तथा रात्रि सूक्त के बाद क्रम से पढ़े जाते हैं। कई परंपराओं में पहले और बाद में न्यास सहित नवार्ण मंत्र का जप भी होता है। यदि आप यह अध्याय अकेले पढ़ रहे हैं, तो ऊपर दिए गए इसके ध्यान से आरम्भ करें, श्लोक बिना जल्दबाजी के पढ़ें, और क्षमापन या सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र से समाप्त करें।

स्वच्छ आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें, घी का दीपक जलाएँ, कलश में जल रखें, और स्मृति से नहीं बल्कि छपे हुए या स्पष्ट दिख रहे पाठ से पढ़ें। अध्याय को बीच में न छोड़ें; रुकना ही पड़े तो पहले अध्याय पूरा करें। किसी विशेष उद्देश्य के लिए हर श्लोक के आगे-पीछे सम्पुट मंत्र जोड़ा जा सकता है, पर ध्यानपूर्वक किया गया सादा पाठ ही आधार है।

ज्योतिषीय संदर्भ

ज्योतिष परंपरा में देवीमाहात्म्य को सबसे व्यापक उपाय के रूप में पढ़ा जाता है: प्रथम चरित्र का सम्बन्ध महाकाली से और राहु, केतु तथा शनि की शान्ति से माना जाता है, मध्यम चरित्र का महालक्ष्मी से और सूर्य तथा गुरु से, और उत्तर चरित्र का महासरस्वती से और बुध तथा शुक्र से। अध्याय 1 प्रथम चरित्र का है, इसलिए जब कुंडली में ये ग्रह कठिन हों या उनकी दशा चल रही हो, तो इसे उस चरित्र के शेष भाग के साथ पढ़ा जाता है। यह आपकी कुंडली पढ़ने का विकल्प नहीं है; यह उसी चित्र का भक्ति-पक्ष है। कौन सी दशा चल रही है, यह देखने के लिए निःशुल्क कुंडली बनाएँ या ज्योतिषी से बात करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय में क्या है?
इससे देवीमाहात्म्य आरम्भ होता है। अपने प्रियजनों से त्यागे गए राजा सुरथ और वैश्य समाधि मेधा ऋषि से पूछते हैं कि मन उन्हीं लोगों से क्यों चिपका रहता है। ऋषि महामाया का परिचय देते हैं और उनका पहला चरित्र सुनाते हैं: ब्रह्मा ने योगनिद्रा की स्तुति की, विष्णु जागे और मधु-कैटभ का वध हुआ। इस अध्याय में 104 श्लोक हैं।

पहला अध्याय किस चरित्र और देवी के किस रूप का है?
पहला अध्याय ही पूरा प्रथम चरित्र है, जिसकी अधिष्ठात्री देवी महाकाली हैं। इसके विनियोग में ऋषि ब्रह्मा, छन्द गायत्री, शक्ति नन्दा और बीज रक्तदन्तिका बताए गए हैं।

पहला अध्याय चिंता दूर करने के लिए क्यों पढ़ा जाता है?
परंपरा हर अध्याय का एक फल बताती है, और पहला अध्याय हर प्रकार की चिंता से मुक्ति के लिए पढ़ा जाता है। इसकी कथा भी दो व्याकुल मनों की है, जिन्हें देवी को समझकर शान्ति मिलती है; इसीलिए मन अशान्त हो तो भक्त इसे अपनाते हैं।

क्या पहले अध्याय से पहले कवच, अर्गला और कीलक पढ़ने चाहिए?
पूरे सप्तशती पाठ में, हाँ। सामान्य क्रम है देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र, फिर रात्रि सूक्त, फिर पहला अध्याय। यदि आप नित्य पाठ में केवल यही अध्याय पढ़ रहे हैं, तो यहाँ दिए गए ध्यान से आरम्भ करें और क्षमा-प्रार्थना या सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र से समाप्त करें।

क्या पहला अध्याय हिंदी में पढ़ा जा सकता है, या संस्कृत में ही पढ़ना चाहिए?
पाठ परंपरागत रूप से संस्कृत में किया जाता है, और साथ में अर्थ पढ़ा जाता है ताकि पाठ समझ में आए। जहाँ संस्कृत उच्चारण सम्भव न हो, वहाँ श्रद्धा से केवल हिंदी अर्थ पढ़ना भी स्वीकृत अभ्यास है।

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