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दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय: महिषासुर वध, संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

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Astro Logics Admin
12 अक्टूबर 2026 · 14 मिनट पढ़ें
दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय: महिषासुर वध, संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

दुर्गा सप्तशती का तीसरा अध्याय, यानी तृतीय अध्याय, वह अध्याय है जिससे देवी को महिषासुरमर्दिनी नाम मिला। यह मध्यम चरित्र का अध्याय है, जिसकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी हैं, और मानक गणना में इसमें 44 श्लोक हैं। अध्याय यहाँ पूरा दिया गया है, ध्यान और हर श्लोक संस्कृत में, और हर श्लोक के बाद उसका अर्थ।

पहले असुर सेना के बचे हुए सेनापति मारे जाते हैं: चिक्षुर, चामर, उदग्र, कराल, उद्धत, बाष्कल, ताम्र, अन्धक, उग्रास्य, उग्रवीर्य, महाहनु, बिडाल, दुर्धर और दुर्मुख। फिर स्वयं महिषासुर लड़ता है, भैंसे से सिंह, सिंह से पुरुष, पुरुष से हाथी और फिर भैंसा बनता हुआ, जब तक देवी "उत्तम मधु" पीकर प्रसिद्ध वाक्य "गरज, गरज ले क्षण भर, मूर्ख" कहकर उसे पैर से दबा नहीं लेतीं और भैंसे के मुख से आधे निकले उसका सिर नहीं काट देतीं। यही वह दृश्य है जो नवरात्रि और दुर्गा पूजा की दुर्गा-प्रतिमाओं में गढ़ा जाता है।

यह अध्याय सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ, सभी 13 अध्याय और अंग पाठ-क्रम में का भाग है।

अध्याय 3 एक नज़र में

  • अध्याय: 13 में तीसरा, "महिषासुर वध" (Mahishasura Vadha)
  • चरित्र: मध्यम चरित्र
  • अधिष्ठात्री देवी: महालक्ष्मी
  • ऋषि: विष्णु
  • छन्द: उष्णिक्
  • शक्ति · बीज · तत्त्व · वेद: शाकम्भरी · दुर्गा · वायु · यजुर्वेद
  • श्लोक: मानक गणना में 44 (उवाच पंक्तियाँ गिनी गई हैं)
  • पाठ का पारम्परिक फल: परंपरा में तीसरा अध्याय शत्रुओं और सताने वालों से छुटकारे के लिए, और किसी लम्बे चले आ रहे संकट के अन्त के लिए पढ़ा जाता है।

अध्याय 3 की कथा संक्षेप में

अपनी सेना कटते देख सेनापति चिक्षुर देवी पर बाणों की वर्षा करता है; देवी उसका धनुष तोड़ देती हैं, घोड़े और सारथि मार देती हैं, जिस तलवार से वह उन पर वार करता है वह टूट जाती है, और अन्त में अपने त्रिशूल से उसे और उसके शूल दोनों को चूर कर देती हैं। चामर हाथी पर आता है; देवी का सिंह हाथी के मस्तक पर कूदकर उसे धरती पर गिराता है और पंजे से उसका सिर उखाड़ देता है। बाकी सेनापति पत्थरों और वृक्षों से, देवी के दाँतों और मुक्कों से, गदा, भिन्दिपाल, बाणों, त्रिशूल और तलवार से मारे जाते हैं। फिर स्वयं महिषासुर भैंसे के रूप में थूथन, खुरों, पूँछ और सींगों से गणों को तितर-बितर करता है, धरती फाड़ता है, पूँछ से समुद्र उमड़ाता है और सींगों से पर्वत उछालता है। देवी उसे पाश में बाँधती हैं; वह सिंह बनता है, फिर तलवारधारी पुरुष, फिर हाथी जिसकी सूँड़ देवी काट देती हैं, फिर दोबारा भैंसा। चण्डिका उत्तम मधु पीती हैं, लाल आँखों से हँसती हैं और उससे कहती हैं कि जब तक गरज सकता है गरज ले। वे उस पर कूदती हैं, पैर से उसका गला दबाती हैं, त्रिशूल से प्रहार करती हैं, और जब असुर भैंसे के मुख से आधा निकलकर छटपटाता है, तब तलवार से उसका सिर काट देती हैं। दैत्य सेना हाहाकार करती भागती है, देवता आनन्दित होते हैं, गन्धर्व गाते हैं और अप्सराएँ नाचती हैं।

दुर्गा सप्तशती अध्याय 3: संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

संस्कृत पाठ देवीमाहात्म्य के मानक पाठ के अनुसार है; श्लोक-संख्या सामान्य 700 श्लोकों वाली गणना है, जिसमें उवाच पंक्तियाँ भी गिनी जाती हैं। हर श्लोक के बाद उसका अर्थ सरल हिंदी में दिया गया है।

ध्यान

ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् ।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम् ।

अर्थ: ॐ। मैं कमल पर विराजमान उन देवी को प्रणाम करता हूँ, जिनकी कान्ति हजार उगते सूर्यों जैसी है, जो लाल रेशमी वस्त्र पहने हैं, जिनके गले में मुण्डमाला है, जिनके स्तन रक्त से रंजित हैं, जो अपने कर-कमलों में जपमाला, पुस्तक, अभय और वर धारण करती हैं, जिनका मुख-कमल तीन नेत्रों से शोभित है, और जिनके मुकुट में चन्द्रमा का रत्न जड़ा है।

श्लोक 1 से 44

ॐ ऋषिरुवाच ॥१॥

अर्थ: ॐ। ऋषि बोले:

निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः ।
सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम् ॥२॥

अर्थ: अपनी सेना का संहार होते देखकर सेनापति चिक्षुर नाम का महान् असुर क्रोध में भरकर अम्बिका से युद्ध करने चला।

स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः ।
यथा मेरुगिरेः श‍ृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः ॥३॥

अर्थ: युद्ध में उस असुर ने देवी पर बाणों की ऐसी वर्षा की जैसे बादल मेरु पर्वत के शिखर पर जल बरसाता है।

तस्य छित्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान् ।
जघान तुरगान्बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम् ॥४॥

अर्थ: देवी ने उसके बाणों के समूह को खेल-खेल में काट दिया, फिर अपने बाणों से उसके घोड़ों को और उनके सारथि को भी मार डाला।

चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छृतम् ।
विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः ॥५॥

अर्थ: उन्होंने उसी क्षण उसका धनुष और ऊँची ध्वजा काट दी, और टूटे धनुष वाले उस असुर के अंगों को तीव्र बाणों से बींध डाला।

सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः ।
अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः ॥६॥

अर्थ: धनुष टूट जाने पर, रथ नष्ट हो जाने पर, घोड़े और सारथि मारे जाने पर वह असुर खड्ग और ढाल लेकर देवी की ओर दौड़ा।

सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि ।
आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान् ॥७॥

अर्थ: अपनी तीखी धार वाली तलवार से सिंह के सिर पर प्रहार करके उसने बड़े वेग से देवी की बाईं भुजा पर भी वार किया।

तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन ।
ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥८॥

अर्थ: हे राजकुमार, उनकी भुजा को छूते ही उसकी तलवार टूट गई। तब क्रोध से लाल आँखों वाले उसने एक शूल उठाया।

चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः ।
जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात् ॥९॥

अर्थ: उस महान् असुर ने उसे भद्रकाली पर फेंका, जो आकाश से गिरते सूर्य-बिम्ब की तरह तेज से जल रहा था।

दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत ।
तेन तच्छतधा नीतं शूलं स च महासुरः ॥१०॥

अर्थ: उस शूल को आते देखकर देवी ने अपना त्रिशूल छोड़ा, जिसने उस शूल के सौ टुकड़े कर दिए, और उस महान् असुर के भी।

हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ ।
आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥११॥

अर्थ: महिष के उस महापराक्रमी सेनापति के मारे जाने पर देवताओं को सताने वाला चामर हाथी पर चढ़कर आया।

सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम् ।
हुङ्काराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ॥१२॥

अर्थ: उसने भी देवी पर शक्ति चलाई, किन्तु अम्बिका ने हुंकार से उस पर प्रहार करके उसे तुरन्त निस्तेज करके धरती पर गिरा दिया।

भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः ।
चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत् ॥१३॥

अर्थ: अपनी शक्ति को टूटकर गिरा देखकर चामर ने क्रोध में शूल फेंका, और देवी ने उसे भी बाणों से काट डाला।

ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः ।
बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा ॥१४॥

अर्थ: तब सिंह उछलकर हाथी के कुम्भस्थल पर जा बैठा और उस देवशत्रु से गरजते हुए बाहुयुद्ध करने लगा।

युध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ ।
युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ॥१५॥

अर्थ: लड़ते-लड़ते वे दोनों हाथी से धरती पर आ गिरे और अत्यन्त क्रोध में भयंकर प्रहारों से लड़ते रहे।

ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा ।
करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक् कृतम् ॥१६॥

अर्थ: फिर सिंह वेग से आकाश में उछला, नीचे आया, और अपने पंजे के प्रहार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।

उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः ।
दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः ॥१७॥

अर्थ: उदग्र को देवी ने युद्ध में पत्थरों, वृक्षों आदि से मार डाला; और कराल को दाँतों, मुक्कों और थप्पड़ों से गिरा दिया।

देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम् ।
बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम् ॥१८॥

अर्थ: क्रुद्ध देवी ने उद्धत को गदा के प्रहारों से चूर कर दिया, बाष्कल को भिन्दिपाल से, और ताम्र तथा अन्धक को बाणों से मारा।

उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम् ।
त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥१९॥

अर्थ: त्रिनेत्रा परमेश्वरी ने उग्रास्य, उग्रवीर्य और महाहनु को भी उसी प्रकार त्रिशूल से मार डाला।

बिडालस्यासिना कायात् पातयामास वै शिरः ।
दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥२०॥

अर्थ: तलवार से उन्होंने बिडाल का सिर धड़ से गिरा दिया, और दुर्धर तथा दुर्मुख दोनों को बाणों से यमलोक भेज दिया।

एवं सङ्क्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः ।
माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥२१॥

अर्थ: इस प्रकार अपनी सेना का नाश होते देख महिषासुर ने अपने भैंसे के रूप में उन गणों को त्रस्त करना शुरू किया।

कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान् ।
लाङ्गूलताडितांश्चान्यान् श‍ृङ्गाभ्यां च विदारितान् ॥२२॥

अर्थ: कुछ को उसने थूथन की मार से, कुछ को खुरों की ठोकर से, कुछ को पूँछ की फटकार से और कुछ को सींगों से चीरकर गिराया।

वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च ।
निःश्वासपवनेनान्यान्पातयामास भूतले ॥२३॥

अर्थ: कुछ को अपने वेग से, कुछ को गर्जना से, कुछ को चक्कर काटने से और कुछ को श्वास की हवा से धरती पर गिरा दिया।

निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः ।
सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ॥२४॥

अर्थ: गणों की सेना को गिराकर वह असुर महादेवी के सिंह को मारने दौड़ा; इस पर अम्बिका को क्रोध आया।

सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः ।
श‍ृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च ॥२५॥

अर्थ: वह महापराक्रमी भी क्रोध में खुरों से धरती को रौंदने लगा, सींगों से ऊँचे पर्वतों को उछालने लगा और गर्जने लगा।

वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत ।
लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥२६॥

अर्थ: उसके वेग से चक्कर काटने से कुचली हुई धरती फटने लगी; उसकी पूँछ की मार से समुद्र चारों ओर उमड़ पड़ा।

धुतश‍ृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं खण्डं ययुर्घनाः ।
श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ॥२७॥

अर्थ: उसके हिलते सींगों से छिदकर बादल टुकड़े-टुकड़े हो गए; और उसकी साँस की हवा से उछले सैकड़ों पर्वत आकाश से गिरने लगे।

इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम् ।
दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत् ॥२८॥

अर्थ: क्रोध से फूले हुए उस महान् असुर को अपनी ओर आते देखकर चण्डिका ने उसके वध के लिए क्रोध धारण किया।

सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम् ।
तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे ॥२९॥

अर्थ: उन्होंने पाश फेंककर उस महान् असुर को बाँध लिया; उस महायुद्ध में बँध जाने पर उसने भैंसे का रूप छोड़ दिया।

ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः ।
छिनत्ति तावत् पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ॥३०॥

अर्थ: तब वह उसी क्षण सिंह बन गया; और जब अम्बिका उसका सिर काट ही रही थीं, तब हाथ में तलवार लिए एक पुरुष दिखाई दिया।

तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः ।
तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः ॥३१॥

अर्थ: देवी ने तुरन्त उस पुरुष को उसकी तलवार और ढाल सहित बाणों से काट डाला; तब वह एक विशाल हाथी बन गया।

करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च ।
कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ॥३२॥

अर्थ: सूँड़ से उसने उस महान् सिंह को खींचा और चिंघाड़ा; खींचते समय देवी ने तलवार से उसकी सूँड़ काट दी।

ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः ।
तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥३३॥

अर्थ: तब उस महान् असुर ने फिर भैंसे का शरीर धारण किया, और पहले की तरह चराचर सहित तीनों लोकों को क्षुब्ध करने लगा।

ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम् ।
पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥३४॥

अर्थ: तब जगन्माता चण्डिका ने क्रोध में भरकर बार-बार उत्तम मधु पिया, और उनकी आँखें लाल हो गईं और वे हँसने लगीं।

ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः ।
विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ॥३५॥

अर्थ: वह असुर भी अपने बल और पराक्रम के मद में गरजा, और सींगों से चण्डिका पर पर्वत फेंकने लगा।

सा च तान्प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः ।
उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम् ॥३६॥

अर्थ: उसके फेंके पर्वतों को बाणों की झड़ी से चूर करती हुई देवी ने उससे कहा, मद से उनके मुख पर लालिमा थी और स्वर में आवेश।

देव्युवाच ॥३७॥

अर्थ: देवी बोलीं:

गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् ।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥३८॥

अर्थ: "गरज, गरज ले क्षण भर, मूर्ख, जब तक मैं मधु पीती हूँ। यहीं मेरे हाथों तेरे मारे जाने पर शीघ्र ही देवता गरजेंगे।"

ऋषिरुवाच ॥३९॥

अर्थ: ऋषि बोले:

एवमुक्त्वा समुत्पत्य सारूढा तं महासुरम् ।
पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥४०॥

अर्थ: ऐसा कहकर वे उछलीं, उस महान् असुर पर चढ़ बैठीं, पैर से उसका गला दबाया और त्रिशूल से उस पर प्रहार किया।

ततः सोऽपि पदाक्रान्तस्तया निजमुखात्तदा ।
अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्देव्या वीर्येण संवृतः ॥४१॥

अर्थ: तब उनके पैर से दबा हुआ वह अपने ही मुख से आधा बाहर निकला, देवी के पराक्रम से घिरा हुआ।

अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः ।
तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥४२॥

अर्थ: आधा बाहर निकला हुआ वह महान् असुर अब भी लड़ रहा था, तभी देवी ने अपनी बड़ी तलवार से उसका सिर काटकर उसे गिरा दिया।

ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् ।
प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः ॥४३॥

अर्थ: तब दैत्यों की सारी सेना हाहाकार करती हुई नष्ट हो गई, और समस्त देवगण परम आनन्द से भर उठे।

तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सहदिव्यैर्महर्षिभिः ।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥४४॥

अर्थ: देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ देवी की स्तुति की; गन्धर्वराज गाने लगे और अप्सराओं के समूह नाचने लगे।

॥ स्वस्ति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
उवाच ३, अर्धश्लोकाः ४१, श्लोकाः ४४, एवमादितः ॥ २१७॥

अर्थ: इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण के सावर्णिक मन्वन्तर में देवीमाहात्म्य का महिषासुर वध नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ। तीन उवाच, इकतालीस अर्धश्लोक और चौवालीस श्लोक: आरम्भ से कुल दो सौ सत्रह।

अध्याय 3 के पाठ का महत्त्व और लाभ

परंपरा हर अध्याय का एक फल बताती है, और तीसरा अध्याय शत्रुओं से छुटकारे के लिए और उस संकट से मुक्ति के लिए पढ़ा जाता है जो रूप बदल-बदलकर लौटता रहता है, ठीक जैसे कथा में महिषासुर करता है। महानवमी और विजयादशमी पर भी भक्त इसी अध्याय की ओर मुड़ते हैं, क्योंकि महिषासुर का वध ही वह विजय है जिसका उत्सव उन दिनों होता है।

श्लोक 38, गर्ज गर्ज क्षणं मूढ, "गरज, गरज ले क्षण भर, मूर्ख", सप्तशती की सबसे अधिक उद्धृत पंक्तियों में से है। अन्तिम प्रहार से पहले देवी के उत्तम पान (श्लोक 34) को परंपरा में इस रूप में समझा जाता है कि उग्र शक्ति युद्ध के उन्माद को अपने में समा लेती है ताकि भय के लिए कुछ शेष न रहे; यह अनुकरण का निमन्त्रण नहीं है। अध्याय देवताओं, ऋषियों, गन्धर्वों और अप्सराओं के उत्सव के साथ समाप्त होता है, जो सीधे चौथे अध्याय की महान् स्तुति में ले जाता है।

अध्याय 3 कैसे पढ़ें (विधि)

सम्पूर्ण सप्तशती पाठ में अध्याय तीनों अंगों, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र, तथा रात्रि सूक्त के बाद क्रम से पढ़े जाते हैं। कई परंपराओं में पहले और बाद में न्यास सहित नवार्ण मंत्र का जप भी होता है। यदि आप यह अध्याय अकेले पढ़ रहे हैं, तो ऊपर दिए गए इसके ध्यान से आरम्भ करें, श्लोक बिना जल्दबाजी के पढ़ें, और क्षमापन या सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र से समाप्त करें।

स्वच्छ आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें, घी का दीपक जलाएँ, कलश में जल रखें, और स्मृति से नहीं बल्कि छपे हुए या स्पष्ट दिख रहे पाठ से पढ़ें। अध्याय को बीच में न छोड़ें; रुकना ही पड़े तो पहले अध्याय पूरा करें। किसी विशेष उद्देश्य के लिए हर श्लोक के आगे-पीछे सम्पुट मंत्र जोड़ा जा सकता है, पर ध्यानपूर्वक किया गया सादा पाठ ही आधार है।

ज्योतिषीय संदर्भ

ज्योतिष परंपरा में देवीमाहात्म्य को सबसे व्यापक उपाय के रूप में पढ़ा जाता है: प्रथम चरित्र का सम्बन्ध महाकाली से और राहु, केतु तथा शनि की शान्ति से माना जाता है, मध्यम चरित्र का महालक्ष्मी से और सूर्य तथा गुरु से, और उत्तर चरित्र का महासरस्वती से और बुध तथा शुक्र से। अध्याय 3 मध्यम चरित्र का है, इसलिए जब कुंडली में ये ग्रह कठिन हों या उनकी दशा चल रही हो, तो इसे उस चरित्र के शेष भाग के साथ पढ़ा जाता है। यह आपकी कुंडली पढ़ने का विकल्प नहीं है; यह उसी चित्र का भक्ति-पक्ष है। कौन सी दशा चल रही है, यह देखने के लिए निःशुल्क कुंडली बनाएँ या ज्योतिषी से बात करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती के तीसरे अध्याय में क्या होता है?
महिषासुर की सेना के बचे हुए सेनापति मारे जाते हैं, और फिर स्वयं महिषासुर। वह भैंसे से सिंह, पुरुष, हाथी और फिर भैंसा बनता है; देवी उसे बाँधती हैं, पैर से दबाती हैं और भैंसे के मुख से निकलते हुए उसका सिर काट देती हैं। इस अध्याय में 44 श्लोक हैं।

देवी को महिषासुरमर्दिनी क्यों कहा जाता है?
इसी अध्याय के कारण। "मर्दिनी" का अर्थ है मर्दन करने वाली; जिन देवी ने महिष नामक असुर का मर्दन किया, वे महिषासुरमर्दिनी हैं, और भैंसे पर पैर रखे हुए और उससे निकलते असुर वाली उनकी प्रतिमा श्लोक 40 से 42 से आती है।

"गर्ज गर्ज क्षणं मूढ" का क्या अर्थ है?
यह श्लोक 38 है: "गरज, गरज ले क्षण भर, मूर्ख, जब तक मैं मधु पीती हूँ। यहीं मेरे हाथों तेरे मारे जाने पर शीघ्र ही देवता गरजेंगे।" यह इस अध्याय में देवी का एकमात्र वचन है, जो अन्तिम प्रहार से ठीक पहले कहा गया।

तीसरा अध्याय अकेले कब पढ़ा जाता है?
परंपरा में इसे शत्रुओं और लगातार बने संकट से छुटकारे के लिए पढ़ा जाता है। बहुत से भक्त इसे महानवमी या विजयादशमी पर भी पढ़ते हैं, जो महिषासुर पर विजय के उत्सव के दिन हैं, और जब मध्यम चरित्र अकेले पढ़ा जाता है तब यह उसका भाग होता ही है।

मध्यम चरित्र में कौन से अध्याय आते हैं?
अध्याय 2, 3 और 4। दूसरा अध्याय देवी की उत्पत्ति और असुर सेना के विनाश का है, तीसरा महिषासुर की मृत्यु का, और चौथा उसके बाद देवताओं द्वारा की गई स्तुति का। तीनों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी हैं।

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