Pooja Vidhi

इन्दिरा एकादशी 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, पारण समय, व्रत कथा एवं मंत्र

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Astro Logics Admin
2 अक्टूबर 2026 · 6 मिनट पढ़ें
इन्दिरा एकादशी 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, पारण समय, व्रत कथा एवं मंत्र

इन्दिरा एकादशी 2026 मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को है। यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है — पितृ पक्ष के भीतर पड़ने वाली, पितरों के लिए रखी जाने वाली एकादशी — और पारण बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को 06:17 AM से 11:17 PM के बीच किया जाता है।

नीचे इन्दिरा एकादशी 2026 की पूरी जानकारी है — तिथि का समय, शुभ मुहूर्त, पारण की अवधि और वह किस नियम से निकली, व्रत विधि, व्रत कथा और भगवान विष्णु, शालिग्राम रूप में के मंत्र। इस पृष्ठ की हर तिथि और हर समय हमारे अपने वैदिक पंचांग से दिल्ली के लिए गणना किया गया है, किसी कैलेंडर से लिया नहीं गया — आप इन्हें हमारे निःशुल्क दैनिक पंचांग पर स्वयं जाँच सकते हैं।

इन्दिरा एकादशी 2026: तिथि, समय और पारण

व्रत तिथिमंगलवार, 6 अक्टूबर 2026
मास एवं पक्षआश्विन, कृष्ण पक्ष
एकादशी तिथि आरम्भमंगलवार, 6 अक्टूबर 2026, प्रातः 02:08
एकादशी तिथि समाप्तबुधवार, 7 अक्टूबर 2026, रात्रि 12:35
पारणबुधवार, 7 अक्टूबर 2026, 06:17 AM से 11:17 PM
नक्षत्र / योगAshlesha / Sadhya

इन्दिरा एकादशी 2026 शुभ मुहूर्त (दिल्ली)

  • ब्रह्म मुहूर्त: 04:41 AM to 05:29 AM
  • अभिजित मुहूर्त: 11:45 AM to 12:33 PM
  • सूर्योदय / सूर्यास्त: 06:17 / 18:02
  • राहु काल (त्याज्य): 03:05 PM to 04:33 PM

चंद्रमा आश्लेषा नक्षत्र में हैं और शुभ साध्य योग चल रहा है — साध्य अर्थात "जो सिद्ध किया जा सके", और यह शब्द उस व्रत के लिए उपयुक्त है जिसका पूरा उद्देश्य ही उनके लिए कुछ पूर्ण करना है जो अब स्वयं कुछ नहीं कर सकते।

ये समय दिल्ली के लिए हैं। भारत में सूर्योदय लगभग चालीस मिनट तक आगे-पीछे होता है और उसी के साथ मुहूर्त भी खिसकते हैं — अपने नगर का समय पंचांग पर देखें।

इन्दिरा एकादशी पारण का समय

पारण बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को 06:17 AM से 11:17 PM तक है। हरि वासर प्रातः 06:15 बजे, सूर्योदय से दो मिनट पहले समाप्त होता है, इसलिए पारण की अवधि सूर्योदय के साथ ही खुल जाती है।

यह अवधि इस प्रकार निकलती है — पारण द्वादशी को, सूर्योदय के बाद, हरि वासर (द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग, जिसमें पारण वर्जित है) बीत जाने पर, और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले किया जाता है। अवधि के आरम्भ में पारण करना विलम्ब से करने की अपेक्षा उत्तम माना गया है, और द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना व्रत के फल को नष्ट करने वाला कहा गया है।

इन्दिरा एकादशी का महत्व

इन्दिरा एकादशी वर्ष की वह एकमात्र एकादशी है जिसका पुण्य अपने लिए नहीं रखा जाता। यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में — अर्थात पितृ पक्ष के भीतर — पड़ती है, और व्रत का सम्पूर्ण फल पितरों को अर्पित किया जाता है, विशेषकर उस पूर्वज को जो अपनी आगे की यात्रा में रुका हुआ माना जाता हो। जो परिवार इस पक्ष में श्राद्ध करते हैं, वे प्रायः इसी व्रत को उसका समापन मानते हैं। यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष बताया गया है, तो हिन्दू वर्ष में यही दिन उससे सबसे सीधे जुड़ा हुआ है।

इन्दिरा एकादशी व्रत विधि

  • ब्रह्म मुहूर्त (04:41 से 05:29 AM) में उठकर स्नान करें और संकल्प लें — व्रत किस हेतु है, यह स्पष्ट कहें।
  • पूजा स्थान स्वच्छ करें, भगवान विष्णु, शालिग्राम रूप में का चित्र या विग्रह स्थापित करें और घी का दीपक जलाएँ।
  • तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन, धूप, फल और पंचामृत अर्पित करें। किसी भी विष्णु व्रत में तुलसी अनिवार्य है — परन्तु एकादशी के दिन तुलसी न तोड़ें; पत्ते एक दिन पूर्व संध्या को ही तोड़ लें।
  • नीचे दिए विष्णु मंत्रों का जप करें और इन्दिरा एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  • स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखें — निर्जला कठिनतम रूप है और वैकल्पिक है; फल, दूध और जल सहित फलाहार सामान्य प्रचलन है। चावल और अन्न का त्याग हर एकादशी व्रती करता है।
  • संध्या भजन और भगवान विष्णु की आरती में बिताएँ। अनेक घरों में रात्रि जागरण भी किया जाता है।
  • अगले दिन ऊपर दी गई अवधि में पारण करें, उससे पूर्व किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन और दक्षिणा अर्पित करें।

इन्दिरा एकादशी व्रत कथा

महिष्मती नगरी में राजा इन्द्रसेन राज्य करते थे — धर्मपरायण, न्यायी और निश्चिंत। एक दिन ऋषि नारद उनके दरबार में वह समाचार लेकर आए जो कोई राजा सुनना नहीं चाहता।

नारद ने बताया कि वे यमलोक होकर आए हैं और वहाँ उन्होंने राजा के पिता को देखा है। वृद्ध राजा भले पुरुष थे, परन्तु जीवन में एक बार एकादशी व्रत का संकल्प भंग हो गया था, और उसी एक चूक के कारण वे आगे नहीं बढ़ सके। उनका पुत्र के लिए संदेश था — इन्दिरा एकादशी का व्रत करो और उसका पुण्य मुझे दे दो, मैं मुक्त हो जाऊँगा।

इन्द्रसेन ने न तर्क किया, न विलम्ब। उन्होंने पिता का श्राद्ध किया, ब्राह्मणों को भोजन कराकर सम्मानित किया, समस्त परिवार सहित आश्विन कृष्ण एकादशी का व्रत रखा, और अंत में उसका कण-कण पुण्य पिता को अर्पित कर दिया — अपने लिए कुछ भी शेष न रखा।

पुण्य वहीं पहुँचा जहाँ भेजा गया था। पिता उस अवस्था से मुक्त होकर ऊर्ध्वलोक चले गए, और इन्द्रसेन, जिन्होंने अपने लिए कुछ माँगा ही नहीं था, दीर्घकाल तक सुखपूर्वक राज्य करते रहे और उनके बाद उनका पुत्र राजा हुआ। यही इन्दिरा एकादशी का वचन है — यह व्रत किसी और के लिए किया जाता है, और कहा जाता है कि यह उन तक पहुँचता है।

इन्दिरा एकादशी के मंत्र

पूजा और दिनभर के जप में इन मंत्रों का उच्चारण करें:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

ॐ नमो नारायणाय॥

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्‌॥

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः॥

सम्पूर्ण आरती, चालीसा और मंत्र हमारे भक्ति संग्रह में उपलब्ध हैं, और एकादशी माता की आरती वही है जो अधिकांश परिवार संध्या दीप के समय गाते हैं।

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यह वही एकादशी है जिसका उद्देश्य ही पितर की मुक्ति बताया गया है, और यह पितृ पक्ष के भीतर पड़ती है — इसलिए पिंडदान और तर्पण उसी पक्ष और उसी संकल्प के अंग हैं। यदि आप चाहते हैं कि यह विधिवत पंडितों द्वारा आपके नाम के संकल्प के साथ कराई जाए — रिकॉर्ड किया गया वीडियो, छायाचित्र और प्रसाद आप तक पहुँचाया जाए — तो इस व्रत के अनुकूल ये दो अनुष्ठान हैं:

प्रत्येक पूजा व्यक्तिगत, पारिवारिक और महा — तीनों स्तरों में उपलब्ध है; पूरी सूची ऑनलाइन पूजा स्टोर में देखें।

इन्दिरा एकादशी 2026: सामान्य प्रश्न

इन्दिरा एकादशी 2026 कब है?
इन्दिरा एकादशी 2026 मंगलवार, 6 अक्टूबर को है। एकादशी तिथि 6 अक्टूबर प्रातः 02:08 बजे आरम्भ होकर 7 अक्टूबर रात्रि 12:35 बजे समाप्त होती है।

इन्दिरा एकादशी 2026 का पारण समय क्या है?
पारण बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को प्रातः 06:17 से रात्रि 11:17 तक (दिल्ली) है। हरि वासर प्रातः 06:15 बजे, सूर्योदय से दो मिनट पहले समाप्त होता है, इसलिए अवधि सूर्योदय से ही खुल जाती है।

इन्दिरा एकादशी पितरों के लिए क्यों रखी जाती है?
यह पितृ पक्ष के भीतर पड़ती है, और इसकी कथा स्पष्ट रूप से एक पुत्र की है जिसने इस व्रत का पुण्य अर्पित करके अपने पिता को रुकी हुई गति से मुक्त कराया। इसका पुण्य अपने पास रखा नहीं जाता, दे दिया जाता है।

क्या माता-पिता के जीवित रहते इन्दिरा एकादशी रख सकते हैं?
हाँ। यह व्रत कुल के समस्त पितरों को अर्पित होता है, केवल किसी दिवंगत माता-पिता को नहीं, और प्रायः उसी पक्ष के श्राद्ध कर्म के साथ रखा जाता है।

यह व्रत आपके लिए वैसा फल देगा या नहीं, यह केवल तिथि पर निर्भर नहीं करता — यह इस पर निर्भर करता है कि आपकी कौन-सी दशा चल रही है और आपकी अपनी कुंडली क्या कह रही है। आरम्भ अपनी निःशुल्क कुंडली से कीजिए, ₹49 में विस्तृत 46 पृष्ठ की कुंडली रिपोर्ट लीजिए, या अपनी कुंडली के अनुसार सही व्रत और उपाय जानने के लिए ज्योतिषी से बात कीजिए। कोई संस्कार करना है? निःशुल्क मुहूर्त खोजक आपके लिए दिनों को क्रम में लगा देगा।

इसी श्रृंखला से और: कामिका एकादशी · देवशयनी एकादशी · अजा एकादशी · परिवर्तिनी एकादशी।

सूचना: इस पृष्ठ की तिथियाँ और समय हमारे अपने वैदिक पंचांग से दिल्ली (28.61°उ, 77.21°पू) के लिए गणना किए गए हैं और उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत मास के अनुसार हैं। ये नगर और पंचांग परम्परा के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। पारण की अवधि मानक नियम — सूर्योदय के बाद, हरि वासर के बाद, द्वादशी समाप्ति से पूर्व — से निकाली गई है। व्रत रखने से पूर्व अपने परिवार के पंचांग अथवा किसी विद्वान पंडित से पुष्टि अवश्य कर लें।

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